पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के
 "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार एमलेन बोदरा की एक कविता  जिसका शीर्षक है “मेरी माँ”:

 
मुर्गे के बाँगते ही चार बजे
रोज उठती बड़े सवेरे  मेरी माँ
बर्तन माँजती, खाना बनाती
और झाड़ती-बुहारती घर-आँगन
सात बजे निकलती घर से
ढोकर पोटली संग अपने और
बाँधकर मुझे भी पीठ पीछे अपने।
 
सुखी रोटी चबाते-चबाते
कुछ चलकर,कुछ दूर दौड़ कर
और कभी गिरत-पड़तेे,
पहुँचती है दस नंबर सेक्शन
चाय बगान में,मेरी माँ।
 
घास-फूस के बीच बनी
तिरपाल तम्बू में मुझे छोड़कर
पहनती है तिरपाल प्लास्टिक
जैसे पहनते यूनिफार्म स्कूल के।
तन जलाती गर्मी हो या
हड्डी कंपाती ठण्डी
या हो झमाझम बारिश
यही तिरपाल प्लास्टिक
है रक्षाकवच उसकी।
 
उलझे-बिखरे-फैले
चाय डालियों को सुलझाती
जैसे सुलझाती समस्याएं घर की
और तोड़ती कोमल पतियाँ चाय की।
 
 
तीस-चालीस किलो पत्ते ढोकर
और बाँधकर मुझे भी
पीठ पीछे अपने
कुछ चलकर,कुछ दौड़कर
पहुँचती है चाय गोदाम
और करती पत्तों को हवाले
 
 फिर लौटती घर की ओर
हँसते,बतियाते सखियों संग
देखती हूँ मैं सबकुछ बचपन से ही
कैसे करती है कड़ी मेहनत माँ।
 
खाती है आधा पेट रूखी-सुखी
पहनती है वही एक नीली साड़ी
जिसे खरीदी थी बोनस से वह
जोगाती है पैसा-कौड़ी मेरे लिए
कि भेज सके मुझे
स्कूल-कॉलेज के द्वार
है एक सपना उसका
कि बन जाऊँ मैं किसी काबिल
बस यही है मेरी माँ की कहानी।।