पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंस" से प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिका" के वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार पंडित नितिन त्रिगुणायत "वरी" की एक लघुकथा जिसका शीर्षक है “गृह क्लेश-विनाश का प्रमुख कारण":
रामलाल मोहल्ले की चौपाल से गुजर रहा था, चौपाल में बैठे लोग रामलाल को देखकर कहने लगे देखो कैसा निकम्मा निकला शादी
होते ही अपनी मां को वृद्धा आश्रम छोड़ आया, चौपाल में बैठे एक चाचा
रामलाल की ओर इशारा करते हुए जोरू का गुलाम है, बताओ ऐसे भी कोई करता है।
सब थू थू कर रहे थे। रामलाल् नजर घुमाते हुए बिल्कुल अंजान बन कर निकल जाता है।
घर आते ही सुनीता से बोला, अब तो बाहर निकलना भी दूभर हो रहा है, (सुनीता झुझलाते हुए) बुढ़िया साथ थी फिर भी चैन
नहीं लेने दिया और अब भी, हाय राम मेरी तो किस्मत ही
खराब है यह कह कर रोने लगती हैं, रामलाल अरे तुम क्यों रो रही
हो लोगों का तो काम ही है कहना हमें लोगों से क्या करना है, जाओ खाना लगाओ मै हाथ मुंह धोकर आता हूं।
सुनीता आंख से आंसू पोछते हुए रसोई की तरफ
चली जाती है।
रामलाल तोलिया उठाकर हाथ मुंह पूछ रहे थे हुये तब तक मोहल्ले का एक लड़का दौड़ते हुए आया, वृद्ध आश्रम में तुम्हारी मां ने फांसी लगा ली है रामलाल सन्न रह गया , सुनीता सुनीता (तेज आवाज में बुलाते हुए) रसोई से आवाज आई क्या है जी ला रही
हूं अभी (सुनीता थाली लेकर बाहर आते हुए) अरे सुन रही हो मां ने वृद्धआश्रम में
फांसी लगा ली है सही रहा बुढ़िया चल बसी (सुनीता ने झुझलाते हुए कहा) अरे आज तेरी वजह से मेरी मां नहीं रही तेरे कहने पर मैं उन्हें छोड़ आया था, सोचा था
क्लेश ना हो लेकिन अब उनसे कभी नहीं मिल पाऊंगा (रोते
हुए रामलाल ने कहा) रामलाल ने वृद्धआश्रम से लाकर मां का अंतिम संस्कार किया।
अब पश्चाताप की अग्नि में जल रहा है लेकिन सुनीता के तेवर अभी नहीं बदले अब दोनों में बोलचाल भी बंद है।


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