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लघुकथा: पाप का पैसा (सीमा गर्ग मंजरी, मेरठ, उत्तर प्रदेश)

 

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी -पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार सीमा गर्ग मंजरी की एक लघुकथा  जिसका शीर्षक है “पाप का पैसा":

 पिताजी की मृत्यु के बाद कारखाने का सारा काम रमेश ने संभाल लिया । छोटा भाई सुरेश अभी छोटा था । रमेश ने स्नातक के बाद उसकी पढाई छुडाकर उसे कारखाने में प्रबंधक का काम सौंप दिया था । सुरेश का विवाह करने के बाद दोनों की गृहस्थी बढी और दोनों भाइयों के अलग-अलग मकान बन गये । मन में खोट आ जाने के कारण रमेश ने पिताजी द्वारा छोडा गया बहुत सा पैसा और जेवर चतुराईपूर्वक दबा लिया । सुरेश मन का भोला भाला था । उसने कभी भी अपने बडें भाई से पैसे का हिसाब किताब नहीं मांगा था । किंतु ईश्वर बहुत न्यायप्रिय और दयालु है । उनके घर देर है अन्धेर नहीं है । रमेश के चार पुत्रों में से एक के बाद एक चारों पुत्र और पत्नि अचानक बीमार हो कर गुजर गये । रमेश का हंसता खेलता घर संसार कुछ ही सालों में उजड़ गया । रमेश का सारा पैसा उन सबकी बीमारी में लग चुका था । आज रमेश दाने दाने के लिए मोहताज हो गया था । भरी दुनिया में अब वह निपट अकेला और कंगाल था । रमेश अपनी करनी पर पछताता और सिर धुनता रहता था ।

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