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कविता: राम राम राम (कल्पना गुप्ता "रतन", जम्मू एंड कश्मीर)

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंस" से प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिका" के वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार कल्पना गुप्ता "रतन" की एक कविता जिसका शीर्षक है "राम राम राम":

बरसों बाद बसे घर अपने राम,

नाचे झूमें मिलकर सारा धाम।

था  लंबा बहुत उनका बनवास,

पांच सौ वर्षों के बाद मिला वास।

कहते जिन्हें सब मर्यादा राम,

चौदह वर्ष गुजारे बन में राम।

भगवान को ना मिला आराम,

सीखो जीना उनसे, रहे कैसे राम।

आज पधारे अयोध्या राम,

सब मिल ले रहे उनका नाम।

आनंद छाया चारों धाम

ब्रह्मा विष्णु विराजे साम धाम

सब देवता फूल बरसाएं,

मिलकर बोल रहे जय श्री राम।

दिल में बसे हनुमान के राम,

संकट दूर करें प्रभु राम।

भक्त पधारे प्रभु के धाम,

प्रसन्नचित्त, हो कर रहे सारे काम।

अयोध्या है एक पावन धाम,

जहां हुए थे पैदा जय श्री राम

विश्व में फैला एक ही नाम,

जय श्रीराम, जय श्रीराम।

हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई,

सब मिलकर बोलें जय सिया राम।

मेरे मन में बसे मेरे राम,

सबके मन में बसे श्री राम।

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