पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंस" से प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिका" के वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार स्वाति पाण्डेय भारती की एक कविता जिसका शीर्षक है “मातृभूमि तेरे प्रेम में स्वर्ग त्याग कर आना है":
जब देश प्रेम की
बात होती है
मन प्रफुल्लित हो
उठता है।
भाव बिभोर हृदय,
रोम पुलकित हो
जाता है
नयनों में बसा
हिमालय ,
शिश मुकुट-सा मान
बढ़ाता है।
चरण तल को पखारता
,
अहा! हिन्दसागर
कितना भाता है!
बंगोप और अरब
सागर
तो पूरब -पश्चिम
में लहराता है
हर दिशाओं की तो
छोड़ो
मेरे देश की शोभा
देख-देख
कामदेव अचंभित
होते हैं !
पर्वतों से कल-कल
बहती नदियाँ
खेतों को आनंदित
करती है,
झरने और जलप्रपात
तो
मनमोहक छवि बनाते
हैं ।
माटी से सने
किसान को
वाह! वाह! रवि
स्वयं नमन करते हैं,
सृजन कर्ता स्वयं
यहाँ
बारम्बार जन्मकर
खुश होते हैं ।
भिन्न-भिन्न वेश, रूप, रंग, बोली
भिन्न-भिन्न मजहब
और पहनावा है,
साम्प्रदायिकता
तो सिर्फ़ छलावा है।
हर कदम पर
परिवर्तित
दृश्यों ने
लुभाया है
इसी खुबसूरती ने
तो
इसे अभिन्न बनाया
है।
हर गम को इस माटी
ने
अपनी सुन्दरता से
मिटाया है
जब भी किसी ने
नज़र उठाया है
समूल उसे मिटाया
है
ना जाने कोई कैसे
इससे
दूर रह सकता है
इसकी सुन्दरता को
देख
मन गौरवान्वित
होता है
मेरा देश मेरी
धड़कनो में
हरवक्त धड़कता
है।
यदि जन्म लूँ
पुनः धरा पर
बस यही जन्मकर
आना है
मातृभूमि तेरे
प्रेम में तो
स्वर्ग त्याग कर
आना है ।


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