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कविता: वीर सपूतों तुम्हें प्रणाम... (राजीव भारती, गौतम बुद्ध नगर, नोयडा, उत्तर प्रदेश)

 

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार राजीव भारती की एक कविता  जिसका शीर्षक है वीर सपूतों तुम्हें प्रणाम...":

नवयुग का नूतन   विहान

जागृत हो उठा हिन्दुस्तान

आओ मिलकर दिया जलाएं

अमर शहीदों की कुर्बानी पर

हमारे स्वाभिमान का प्रतीक

भारत भू का तिरंगा झण्डा

कभी न इसको झुकने देंगे

गौरव का प्रतीक यह झंडा

पन्द्रह अगस्त सन् ४७ को

भारत को मिली थी आज़ादी

जकड़ी थी जो सदियों से

पराधीनता की बेड़ियों से

पर आजादी नहीं सहज़ से

आजाद,भगत की दी कुर्बानी

कम नहीं राजगुरु, सुखदेव

बिस्मिल,मंगल भी बलिदानी

खूनी होली खेली अंग्रेजों ने

जालियांवाला में गोली चलाई

किन्तु कम न आज़ादी परवाने

उन फिरंगियों को धूल चटाई

वृद्ध पिताओं की टूटी आशा

शहीद हुए राष्ट्र के कर्णधार

सुनी हुई माताओं की गोद

उजड़ी व़निताओं के श्रृंगार

स्वतंत्रता की बलिवेदी पर

अनगिनत जान हुए कुर्बान

अत्याचारीअंग्रेजों ने रखी थी

वीर सपूतों पर बंदूकें तान

कोटि-कोटि है उन्हें नमन

जिन्होंने जीवन आहुत की

चढ़ गये हंस हंस शूली पर

पर तनिक भी उफ़ ना की।।

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