पश्चिम
बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंस" से
प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद
हिंदी ई-पत्रिका" के वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके
सामने प्रस्तुत है रचनाकार पृथ्वी राज कुम्हार का दोहा:
(1)
नारी के सहयोग से, पुरुष हुआ बलवान।
नारी को जो संग रखे, हो जाए धनवान।।
भक्ति में यह मीरा बनी,रण में बनी प्रहार।
मर मिटने पर चल पड़ी,ना मानी यह हार।।
महिमा इसकी विस्तृत है, बड़े-बड़े किरदार।
अस्तित्व इसका नहीं रहे, नहीं बने परिवार।।
बेटी से यह बहु बनें,बनें बहू से सास।
सभी रुप के साथ ही,बढ़ जाती है आस।।
(2)
धीरे-धीरे यह बढ़ चली,
कोरोना की धार।
रूप रंग भी बदल गया, बदल गया व्यापार।।
काम सारे रुक गए , रुक गई
पतवार।
हड़कंप इतना हो गया,भूल गए सब वार।।
खाने में कंजूसी हुई ,
हुई खर्चे की पीर।
थोड़े दिन घर क्या रहे,लगने लगी जंजीर।।
विद्या आलय बंद रहे, बढ़ा
सरस्वती ऋण।
हाथ को हिलाया नहीं,हो गए सब उत्तीर्ण।।
कोरोना की चाल से ,
हुए सभी बेहाल।
ना अब इतना हो सके,रखेंगे सभी ख्याल।।
(3)
अगर दुपहिया मिल गया,चौपहिया
से प्यार।
मनसा यह होती रहे, रुपए का इंतज़ार।।
पिया घर से चले गए, हृदय हो
गया तार।
आंख से नीर आ गया, हुआ नहीं इंतज़ार।।
राह तेरी देख रहा,दिन में
सौ-सौ बार।
रात को यह नींद नहीं,बस तेरा इंतज़ार।।
(1)
नारी को जो संग रखे, हो जाए धनवान।।
मर मिटने पर चल पड़ी,ना मानी यह हार।।
अस्तित्व इसका नहीं रहे, नहीं बने परिवार।।
सभी रुप के साथ ही,बढ़ जाती है आस।।
रूप रंग भी बदल गया, बदल गया व्यापार।।
हड़कंप इतना हो गया,भूल गए सब वार।।
थोड़े दिन घर क्या रहे,लगने लगी जंजीर।।
हाथ को हिलाया नहीं,हो गए सब उत्तीर्ण।।
ना अब इतना हो सके,रखेंगे सभी ख्याल।।
मनसा यह होती रहे, रुपए का इंतज़ार।।
आंख से नीर आ गया, हुआ नहीं इंतज़ार।।
रात को यह नींद नहीं,बस तेरा इंतज़ार।।


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