पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंस" से प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिका" के वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार प्रतीक प्रभाकर की एक कविता जिसका शीर्षक है “नया ख्वाब”:
"आज से , अभी से
काहे का रोना है?
घुटने तक पहुँचा मैं।
अब उठ खड़ा होना
है।
दाग लगे जो दामन
पर
कौंधता कुछ जो सीने में
कलुषित जो वक़्त था
नीर से उसको धोना है।
तुमने जो सुलाया
बहुत हुआ
मय, मदिरा दे दे के मुझे
प्रभात हो गयी है, समझे!
न मुझको अब सोना है।
बादल गहरे हो
चाहे जितने
रंग तो सूरज से
होता है
अपना देखो मेरा
वक़्त नया ,
नया ख़्वाब पिरोना है।।


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