पश्चिम
बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंस" से
प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद
हिंदी ई-पत्रिका" के वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके
सामने प्रस्तुत है रचनाकार हरि आनंद की एक कविता जिसका
शीर्षक है “इंसान बना हैवान”:
खण्डर पड़ी ईमारत में, अब कलाकारी करता कौन है
उजड़े हुये, वीरानों में, अब भला घर बसाता कौन है
सिस्कते हुये
चेहरे भी अब यहाँ दिखाते हैं अदाकारी
अब भला माँ, के आँचल में खुलकर रोता कौन है
सब मरमत में लगे
है यहाँ उजड़ी ज़िंदगी को बनाने में
जीवन देंने वाली माँ का दुःख अब भला पुछता कौन है
ये जो नक़ाब, ओढ़कर, नाम बनाने में लगे है अपना
कोई पुछ ले जरा इनसे इनके हुनर के रंग भरता कौन है
सब खेल
रहे है आँख, मिचौली नजरों के फ़रेब से
सच देखकर आँखों से अब भला सच बोलता कौन है
सब सच को झूट
बनाने में करते है मीलों का सफ़र यहाँ
अब सच्चाई की और इक क़दम तक बढ़ाता कौन है
अब किसका करे
ऐतबार यहाँ खुदगर्ज़ी के बाज़ार में
अपने मतलब के आगे अब इंसानियत दिखाता कौन है
सब कुछ मतलब में
बाध दिये ईस्वर तुम्हारे नाम भी
बिना मतलब के राम राम अब भला करता कौन है
सब बेचैनियां
लेकर चले है इक सकुन की तलाश में
हरि में आनंद की तलाश अब भला करता कौन है
खण्डर पड़ी ईमारत में, अब कलाकारी करता कौन है
उजड़े हुये, वीरानों में, अब भला घर बसाता कौन है
अब भला माँ, के आँचल में खुलकर रोता कौन है
जीवन देंने वाली माँ का दुःख अब भला पुछता कौन है
कोई पुछ ले जरा इनसे इनके हुनर के रंग भरता कौन है
सच देखकर आँखों से अब भला सच बोलता कौन है
अब सच्चाई की और इक क़दम तक बढ़ाता कौन है
अपने मतलब के आगे अब इंसानियत दिखाता कौन है
बिना मतलब के राम राम अब भला करता कौन है
हरि में आनंद की तलाश अब भला करता कौन है


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