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कविता: धर्महीन लोकतंत्र (स्वामी प्रेम अरुणोदय, रंगकठेरा डोंगरगांव, राजनांदगांव, छत्तीसगढ़)

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के
 "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार स्वामी प्रेम अरुणोदय की एक कविता  जिसका शीर्षक है “धर्महीन लोकतंत्र”:
 
धर्महीन लोकतंत्र
लोक को ही छल गया
स्वप्न स्वर्ण राष्ट्र का
सिसकियों में जल गया।
 
कहां गई स्वाधीनता
सपने कहां चले गए?
रक्त सिंह सपूत के,
शहीद सब छले गए।
 
दस्यु भरा संसद सभा,
छली ये संविधान है।
न्याय के ही दर‌ यहां,
न्याय लहुलुहान है।
 
भूख,रोग,बेबसी,
शहर - डगर निकल रहे।
लज्जित मनुजता यहां
हो हर हृदय विकल रहे।
 
कूड़ो के ढ़ेर में भविष्य
बीनता बचपन यहां
स्तब्ध है ‌बुलबुल कोयल
मुरझा रहा चमन यहां।
 
यह अधूरा लोकतंत्र,
तंत्र में उलझ गया।
खड़े ज्वलंत प्रश्न हैं,
ना सूझता सुलझ नया।
 
विकृत,भीड़ भेंड़ तंत्र
व्दन्द, द्रोह, दोष है।
जनाधिकार लुप्त है।
बंधन में राजकोष है।
 
कुकुरमुत्तों ‌से उग गए,
नेता गली गली कई।
खीसे निपोर, देश चोर,
फुदक रहे छली कई।
 
फुफकारते हैं देश लील,
कुण्डली में लोक है,
अजगरों का तन्त्र है,
न रोक है न टोक है।
 
रक्त चूस, छल, कपट,
झपट के साथ आ गए।
सांपनाथ चले गए,
तो नागनाथ आ गए।
 
धर्म सत ‌गिरवी धरा
न्याय नित नीलाम है।
कदाचार कीर्तिमान
हरिश्चन्द्र कुनाम है।
 
उमंग सहमें सहमें से,
उत्सव सभी विकल हुए।
कोई कसर बचा नहीं,
छलछला के छल हुए।
 
राष्ट्रपिता सिसक रहा,
सिसक रही मां भारती।
अरदास औ अजान सब,
बिलख रही है आरती।
 
लेकर के जेब घूमते,
कानून ये बाहुबली।
निर्भया भयभीत है,
दाऊद हैं गली गली।
 
असुरों का अट्टहास है,
भूत प्रेत नाचते।
तन्त्र इन्द्रजाल सा,
छल के मन्त्र बांचते।
 
बंधित हजार वर्ष थे
वह दौर अब भी चल रहा।
स्वतंत्रता का स्वप्न‌ प्रश्न
जल नयन में जल रहा।
 
जब सांचा ही गड्ड मड्ड है,
तो मूर्तियों की दोष क्या?
निरपेक्ष धर्म राष्ट्र में,
होश, जोश, रोष क्या?
 
बस पुकार चीख ही,
ध्येय कभी मेरा नहीं।
चाहता इतना यही कि,
स्वर्ग हो धरा यहीं।
 
प्रतिष्ठा न्याय धर्म की
देश में अविलम्ब हो
सत्य, प्रेम, न्याय, पुण्य,
विधि के चार खम्भ हो
 
धर्म निरपेक्ष ये लोकतन्त्र
धर्म सापेक्ष, शुद्ध हो।
उठा के ‌सब वो‌ फेंक दो।
जो‌ धर्म के विरुद्ध हो।
 
पूर जम के खुल‌ कहो,
न्याय शीघ्र निशुल्क हो।
धर्मयुक्त, राष्ट्रनीत
सच्चिदानन्द मुल्क हो।
 
व्दादश मताधिकार को
शीघ्र ही स्वीकार लो
झूठा ये अधिकार नहीं
सच में अधिकार हो।
 
तम शेष न एक खण्ड हो,
न व्देष न घमण्ड हो।
कोई न अण्ड बण्ड हो,
विलग, छली उदण्ड हो।
 
न्याय धरा पे मण्ड हो
प्रेम पुण्य प्रचण्ड हो
न‌ उष्णता न ठण्ड हो
विश्व सत अखण्ड हो।
 
फलें फूलें‌ सभी यहां
धरा पूरा कुटुम्ब हो।
रीते यहां न‌ कुछ रहे
छलकते ‌से नेह कुम्भ हो।
 
स्वागतम् सुस्वागतम्,
न्याय धर्म आगतम्।
प्रखर पूर्ण पूर्णतम्,
देव मनुज भावतम्।

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