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कविता: तेरे खत और चांद (डॉ● विशाल सिंह 'वात्सल्य', राजीव कालोनी, ङीग, भरतपुर, राजस्थान)

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के
 "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार डॉविशाल सिंह 'वात्सल्य' की एक कविता  जिसका शीर्षक है “तेरे खत और चांद
”:
              
तेरा हर खत सम्भाल कर रखा है मैने
शायद तूने.... सारे खत दफ़ना दियें।
मेने इश्क़ सम्भाल कर रखा है अभी भी
शायद तूने .... सारे वादे दफ़ना दियें।
वरना तू कभी बेवफाई ना करतीं
और आज मेरे दुश्मन मुस्करा दियें।
एक एक खत तेरा सम्भाल कर रखा है
तेरे सारे अरमान मेने सजा दियें।
घर सजाया था मेने रोशनियों से
तनहाइयों ने अब सारे दीयें बुझा दियें।
चांद जब करीब था मेने कहा था उस से
चल मेरे चांद से मिलाता हूँ तुझे।
तुझ में दाग हैं बेशक पर तेरे चांदनी से
कितने चर्चे हैं इश्क़ के.... सुनाता हूँ तुझे ।
किसी के लिए शशि, किसी के लिए महताब हैं
हर शख्स चांद के लिए बेकरार है बताता हूँ तुझे ।
यहाँ हर कोई तुझे अपनी महबूब का नाम देता हैं
चांद की उपमा में क्या क्या ना कहा... सुनाता हूँ तुझे।
चांद तू कुछ कुछ मेरे सनम सा लगता है
कभी भोला भाला, कभी गुस्से वाला लगता है।
मेरा चांद भी तेरी तरहां ... रोज मिज़ाज बदलता हैं
कभी पूनम का चांद, तो कभी पर्दे में छुप जाता हैं ।
रोज उसके जेसे तू रूप बदल बदल कर आता है
कभी सामने से, कभी बादलों की औट से छुप कर मिलता है।

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