पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंस" से प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिका" के वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार सुभासिनी गुप्ता की एक कविता जिसका शीर्षक है “फेसबुक चरित्र”:
फेसबुक अजीब पहेली है ,,।
अपनी पसंद को
देखते हैं ,,।
तो सौ पचास पसंद
नापसंद ,,।
करने वाले मिल
जाते हैं ,,,।
उनमें से कुछ समय
पास ,,,।
भेज देते अनुरोध
बहुत ,,।
स्वीकार किया
जाता कुछ ,,,।
तो छोड़ दिया
जाता कुछ ,,।
बन जाते आपस में
मित्र ,,।
बातों का सिलसिला
विचित्र ,,।
मैसेंजर का हाल
करें विस्मित ,,।
चलता विचारों का
दीर्घ सत्र ,,।
फिर सुबह सवेरे
बिन छोड़ें ,,।
बिस्तर सुप्रभात
परोसें जाते ,,।
पल पल का समाचार
मिलते ,,।
आधी रात को शुभ
रात्रि कहते ,,।
प्रबल हुई
आकांक्षा सुनें आवाज ,,।
मैसेंजर पर ही
काल लगा दिया ,,।
बात शुरू होती
हाय हेलो से ,,।
घर परिवार का पता
लगा लिया ,,।
हुई तीव्र कामना, कैसे लें न० ,,।
व्हाट्सअप न०
मांग लिया ,,।
भला मित्र नहीं
करें परेशान ,,।
बदनियत छोड़ें
अपने निशान ,,।
सबके नहीं एक
समान विचार ,,।
मित्रता का ये
कैसा है आधार ,,।
रंग बिरंगे मित्र
हैं जग माहीं ,,।
बात समझ में आवत
नाहीं ,,।
जरूरी है मिलते
हो विचार ,,।
मित्रता का ना हो
व्यापार ,,।
विवादों की जड़
मत भिन्नता ,,।
वहां टिकती नहीं
है मित्रता ,,।
मित्र बनो, करीबी मत बनो ,,।
मर्यादित शब्दों
का चयन करो ,,।
सुप्रभात से शुरू
हुई ये कहानी ,,।
सबसे कहीं, सबकी हुई जुबानी ,,।


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