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कविता: स्कूल काहे ! (बिक्रम साव, कोलकाता, पश्चिम बंगाल)

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार बिक्रम साव की एक कविता  जिसका शीर्षक है “स्कूल काहे !”:


वर्दी पहनी, बैग लिया, निकले घर से सब की तरह,

रास्ते में सलीके से चला सब की तरह,

फिर ए चमड़ा! ए चमड़ा! सुनते काहे!

स्कूल पहुँचा, घण्टी बजी, मास्टर पढ़ाने आए,

सभी बच्चें बेंच पर बैठे,

हमको मास्टर ने नीचे बिठाया काहे!

प्यास लगी, पानी पीने गए,

नल नहीं छुने मिलता काहे!

टिफ़िन होती, खाना दिया जाता,

सभी बच्चे एकसाथ, पंक्ति में बैठकर खाते ,

हमलोगों की अलग पंक्ति होती काहे!

छुट्टी होती, सब बच्चें घर जाते, हमें नहीं जाने मिलता,

मास्टर हमें कहता रहता

खाली क्लासेस में हमें भेजते,

साफ - सफाई करने को, कहते काहे!

फिर झाड़ू लिए, हमें मैदान बुहारना होता काहे!

फिर टॉयलेट में जमी चिकनाई को,

बिंसियो बाल्टी, झाड़ू से साफ करना पड़ता काहे!

आखिर में थक - हार कर घर हम आते,

पढाई पूरी नहीं कर पाते,

ऐसे स्कूल में आखिर जाएँ काहे!

पड़ोसी तो पड़ोसी, मोहल्ला तो मोहल्ला,

गांव तो गांव, शहर तो शहर,

लेकिन, स्कूल काहे!                                   

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