पश्चिम
बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद
पब्लिकेशंस" से प्रकाशित होने वाली
सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिका" के वेब पोर्टल पर आपका स्वागत
है। आज आपके सामने प्रस्तुत है
रचनाकार अभिषेक पाण्डेय की एक कविता जिसका
शीर्षक है “स्त्री जाति की आह”:
जिंदगी के हर मोड़ पर
सताई गयी वो,
कभी दहेज तो
कभी परायी बता कर
जलाई गई वो।
वो स्त्री ही थी
जिसने सर्वस्व अपना त्याग दिया,
ताकि यह संसार
चले
पर फिर भी
कुल्टा और बदचलन ही
बताई गई वो।
अहिल्या को
छला तुमने ही,
पत्थर भी तुमने
ही बनाया!
क्या दोष था
उस अबला का
कब भला ये जग जान पाया?
जिस पतिव्रता
धर्म से
झुका डाला वैदेही ने
उस अभिमानी रावण को,
उसकी पवित्रता पर
सवाल खड़ा कर
उसे भेज दिया तुमने वन को।
देती रही
वो अग्नि परीक्षा
जल कर भी वो शुद्ध रही,
तुम्हारे
अत्याचारों से
आहत होकर,अंततः
पृथ्वीगोद में समा गई वो।
'द्रौपदी को
जीवन भर कष्ट मिले'
यह मांगने वाला
'पुरुष समाज' का पिता ही था,
और रोक
'कौमुदी गदा' श्रीकृष्ण का
पुत्री धर्म निभा गयी वो।
उसने तुमको
क्या कुछ नहीं दिया पर
माँगा कभी कुछ नहीं,
अरे! तुमने तो
उसके
वस्त्र तक खींच डाले,
उसे भी नतमस्तक
स्वीकार गयी वो!
यह गाथा नहीं है,
रामायण और
महाभारत की
घर - घर की यह कहानी है,
वह द्वित सभा की
द्रौपदी
हो गयी आज पुरानी है।
अब तो छः माह की
बच्चियों का भी
होता यहाँ बलात्कार है,
मानवता को
शर्मसार कर
गयी बर्बता की कहानी वो।
बिलख रही अब अबलाएं
अपनी लाज बचाने को,
कोटि दुःशाशन और
दुर्योधन
भरे पड़े हैं, कुदृष्टि गड़ाने को।
विलीन हो रही
मानवता और सभ्यता
नीवं जिसकी तुमने डाली थी,
अब बहुत हुआ
अब नष्ट करो,
इस अधर्म की
कहानी को।
हे सर्वेश्वर!
हे रवि लोचन!
एक बार फिर दुहरा दो,
महाभारत की कहानी
वो।
जिंदगी के हर मोड़ पर
सताई गयी वो,
कभी परायी बता कर
जलाई गई वो।
जिसने सर्वस्व अपना त्याग दिया,
पर फिर भी
कुल्टा और बदचलन ही
बताई गई वो।
छला तुमने ही,
क्या दोष था
उस अबला का
कब भला ये जग जान पाया?
झुका डाला वैदेही ने
उस अभिमानी रावण को,
सवाल खड़ा कर
उसे भेज दिया तुमने वन को।
वो अग्नि परीक्षा
जल कर भी वो शुद्ध रही,
आहत होकर,अंततः
पृथ्वीगोद में समा गई वो।
जीवन भर कष्ट मिले'
'पुरुष समाज' का पिता ही था,
'कौमुदी गदा' श्रीकृष्ण का
पुत्री धर्म निभा गयी वो।
क्या कुछ नहीं दिया पर
माँगा कभी कुछ नहीं,
वस्त्र तक खींच डाले,
स्वीकार गयी वो!
घर - घर की यह कहानी है,
हो गयी आज पुरानी है।
बच्चियों का भी
होता यहाँ बलात्कार है,
गयी बर्बता की कहानी वो।
बिलख रही अब अबलाएं
अपनी लाज बचाने को,
भरे पड़े हैं, कुदृष्टि गड़ाने को।
मानवता और सभ्यता
नीवं जिसकी तुमने डाली थी,
अब नष्ट करो,
हे सर्वेश्वर!
हे रवि लोचन!
एक बार फिर दुहरा दो,


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