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लघुकथा: अंजली शामली और मैं (डॉ . मुश्ताक अहमद शाह 'सहज', मगरधा, हरदा, मध्य प्रदेश)

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार डॉ. मुश्ताक अहमद शाह 'सहज' की एक लघुकथा  जिसका शीर्षक है “अंजली शामली और मैं":


मैं  आज भी शामली को नहीं  भुला पाया हुं। रही बात अंजली की तो वो मेरे कॉलेज में  मेरे साथ ही पढ़ाई कर रही थी ।और मेरी बडी़ अच्छी दोस्त भी  वही थी । आप समझ  सकते हैं कि दोस्ती और मुहब्बत के बीच कितना फ़ासला होता है । दोस्ती को मुहब्बत की आग आख़िकार पिघला ही  देती है। और दोस्ती मुहब्बत में  तब्दील हो कर रहती है । अंजली  बेहद हसीन और दानिशमंद थी। मै रफ़्ता रफ़ता अंजली की मुहब्बत  में  गिरफ़्तार  होता  चला गया । और वो भी मुझको अपना  समझने लगी ।और फ़िर जि़दगी का साथ निभाने की कसमें खोई गयीं।अंजली  की नाराज़गी   सामने आई ।अंजली ने इम्तिहान  की मसरूफ़ियत बता कर  बात को टाल दिया  इम्तिहान  भी हो गए  कॉलेज भी  बंद हो गये ।अंजली अपने  घर लौट गयी मै भी  अपने घर आ गया।और अपने आप को अल्फ़ाजों की दुनिया में मशगूल  कर दिया  ।मन तो नहीं लग रहा था  कहीं  न कहीं अंजली  का ख़्याल  भी था  ।एक रोज़ मैं  अपना मुख्तसर  सा सामान लेकर घर से दूर मेहरा गांव  के डॉकबंगले आ गया।एक रोज़ शाम को हम पगडंडी से होकर नीचे गांव गये ।जहाँ हरिराम ने मुझे एक चारपाई पर बैठ जाने का ईशारा किया और वहीं सामने वाली झोपड़ी के भीतर चला गया ।वापसी में आया तो एक बुजुर्ग शख़्स दादा भी साथ था । कुछ देर बाद एक खुबसुरत नौजवान पहाड़ी लड़की चाय लेकर वहां आई। हम वापस बंगले आ गए । मेरा दिल वहीं लड़की के पास रह गया। मैं शामली में दिलचश्पी लेने लगा था वो भी मुझसे दिल खुल के बातें करने लगी थी । कुछ दिनों बाद हरिराम वापस आया तो नाराज़ सा लगा । शायद उसको मेरा और शामली का आपस में मिलना नागवार लगा था। उसने साफ़ कहा कि मेरा और शामली का विवाह होने वाला है ।तो क्या मै वाकई गुनाह की तरफ बढ़े जा रहा था । नहीं नहीं ।फिर अचानक अंजली न जाने यहां कैसे आ गई ।मेरे पास आकर लिपट कर रोने लगी। सारे शिकवे दूर हो गए थे ।शामली ये सब देखकर वहां से चली गई । मुझे नहीं मालूम वो कब आ गयी थी ।मुझे लगा कि मैं अब कभी भी शामली से नहीं मिल सकूंगा ।मुझे वापस अब लौट जाना था । कार आगे बढ़ने लगी थी और शामली वापस दौड़कर आ गई हांफते हुए नम आंखों से मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाकर एक शाल दिया और कहा साहब हम ठहरे पहाड़ी लोग हमें शहरी चीज़ें रास नहीं आती हैं। ये आपकी अमानत रख लीजिए। और लड़खड़ाते हुए वहां से बीमार की तरह धीरे धीरे वापस लौट रही थी । अंजली बेखबर थी मेरे अंदर के इस तूफ़ान से।

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