पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंस" से प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिका" के वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार गगन मधेसिय की एक कहानी जिसका शीर्षक है “डोली का लुटेरा":
जाड़े की रात थी , गांव में काफी चहल पहल थी , हो भी क्यों न गांव के मुखिया हरी नारायण जी की बड़ी बेटी उर्मिला का विवाह जो था । हर तरफ जगमगाती रोशनी मानो दूधिया चांद में नहा रहा हो गांव । गांव के सभी घरों के लोगो को विवाह में आकर नव वर बधू को शुभ आशीर्वाद देने तथा रात्रि भोज में सम्मिलित होने का निमंत्रण था । कुछ बुजुर्गो तथा नव विवाहित स्त्रियों को छोड़ सारे लोग विवाह में सम्मिलित हुए । मुखिया जी ने विवाह की तैयारी में कोई भी कमी नहीं छोड़ी थी चाहे वो बाजे से लेकर जगमगाती हुई बत्तियों का रास्ते भर सजाना हो या फिर शहर के नामी हलवाई को भोजन एवम् मिस्टान बनाने की जिम्मेदारी देना। घर में हित और रिश्तेदारों की चहल-पहल थी । वधू विवाह के लिए तैयार हो रही थी । सारे लोग बारात के आने का इंतजार कर रहे थे ,तभी कहीं से गोलियों की चलने की आवाज सुनाई दी और इस आवाज़ के साथ ही चारो तरफ भागा दौरी मच गई । इससे पहले कि लोग समझते की ये कैसी आवाज़ थी और लोग इधर उधर भागे क्यों, तभी कुछ लोग अपने हाथों में बंदूक लिए आगे आए, उन लोगो का चेहरा ढका हुआ था और वे जोर -जोर से चिल्लाते हुए कहने लगे -
हम डाकू दुर्जन सिंह के आदमी है और यहां डाका डालने आए है ।
बिना किसी प्रकार के शोर सराबा किए सभी अपने-अपने कीमती गहनें हमें दे दो अन्यथा यहां अनगिनत लाशें बिछा दी जाएगी ।
ठीक उनके पीछे बड़े इत्मीनान से अपने घोड़े पर बैठे खैनी मल रहा था उनका सरदार डाकू दुर्जन सिंह। लंबा चौड़ा कद ,सांवले रंग का मानो ऐसा प्रतीत हो रहा हो स्वयं यमराज आ बैठे हो ।
बस इतना सुनते ही सभी लोगो के होश उड़ गए । डाकू दुर्जन सिंह काफी खूंखार डाकू था और न जाने कितने लोगो की हत्या कर चुका था।वो 'डोली का लुटेरा' नाम से मशहूर था,चूँकि वो केवल विवाह के घर को ही अपना निशाना बनाता था । मानो उसका हृदय मनुष्य का न होकर पाषाण का हो, वो अक्सर विवाह के घरों में ही डाका डालता , ऐसा करने का कारण था कि विवाह के समय एक ही स्थान पर ढेर सारे लोग होते है , कम परिश्रम में अधिक धन अर्जित हो जाती है और उन्हें ऐसे मौके पर लूटने का बहुत अवसर मिलता था ।वे या तो वधू के घर डाका डालते थे नहीं तो वर के घर और यदि दोनों स्थानों पर अवसर ना मिले तो बारात के आने-जाने वाले सुनसान रास्तों पर घात लगाकर डकैती को अंजाम दिया करते थे । रईस व्यापारी के दुकान को लूटना , सरकारी धन या फिर अनाज लूटना थोड़ा कठिन कार्य था क्योकि ये सभी स्थान शहरी क्षेत्र में होते है , डाका डाल कर भागने में परेशानियों का सामना करना पड़ता और साथ ही साथ पुलिस चौकी समीप होती हैं कुछ करते ही पुलिस तुरंत हरकत में आजाती थी । कई सारे मामले थाने में दर्ज थी उसके खिलाफ जिसकी वजह से पुलिस ने उसके माथे पर ५००० का इनाम रख था । इनाम तो बस नाम का था किसी में इतनी साहस न थी कि वो डाकू दुर्जन सिंह को पकड़ने की सोच भी सके ।
मुखिया जी के लाख हाथ जोड़ने पर भी वे नहीं माने और उल्टा उन्हें ही दो हाथ धर दिया जिससे वे बेचारे मूर्छित हो गए । बाराती अभी आए नहीं थे और डाकुओं को मिली सूचना के अनुसार बारातियों के साथ ही पुलिस आ रही थी तो वे उनके पहुंचने से पहले ही सारा काम निपटा कर चले जाना चाहते थे । रोते बिलखते लोगो ने अपनी-अपनी जान की परवाह करते हुए सारा गहना निकाल कर डाकुओं के हाथो में रख दिया , डाकू उसे एक बड़ी सी पोटली में जमा करते गए । सरदार दूर अपनी घोड़ों पर बैठे देखते रहे , उसने कुछ ना कहा बस इशारो में ही कुछ बताता गया और उसके इशारो को समझ उसके साथियों ने सारा धन इकट्ठा कर लिया । बिना किसी प्रकार का विलंभ किए दुर्जन सिंह अपने साथियों के साथ लूटा हुआ धन लेकर वहां से निकल जाता है । उसके जाते ही लोगो की जान में जान आती है और वे सब भगवान का शुक्रियादा करते है ।
दुर्जन सिंह के खिलाफ काफी केस दर्ज थी थाने में , लेकिन कोई थानेदार उसे पकड़ न पाया । वो डकैती कर गंगा जी से सटी जंगलों में छीप जाता, वो स्थान काफी दुर्गम था जो घने जंगलों के बीच जंगली जानवरो से घिरा हुआ था और वहा कोई जाने का साहस नहीं करता था । ऐसी बात नहीं थी कि पुलिस उसे पकड़ने की कोशिश नहीं करती थे, लेकिन उस गुप्त स्थान पर पहुंचना अत्यंत ही कठिन था और अनेक प्रयत्नों के बावजूद पुलिस को सफलता नहीं मिली ।
डाकू दुर्जन सिंह केवल लग्न के समय में ही सक्रिय होता था। लग्न समाप्त होने पर अपने साथियों के साथ आस -पास के ग्राम में मजदूरी किया करता और जानकारियां इकट्ठा करता की अगले लग्न पर किस -किस गांव में शादी है तथा कितना धन खर्च हो रहा है उस शादी में ,बड़े ही चतुराई से वे ये सब पता लगा लेते थे ।गांव में कोई उन्हें नहीं पहचानता, इसका लाभ उन्हें मिलता, वे बड़े मजे से अपनी योजनाएं एवम् चिन्ह बना लेते कि गांव में किस स्थान पर उन्हें डाका डालना है और रात्रि के अंधेरे में बड़े ही सरलता से उस स्थान को पहचान कर अपना कार्य संपन्न कर लेते।
इस प्रकार धन अर्जित कर क्या होता, आखिर सरदार इतना धन का स्वामी हो गया था कि वो बड़े आराम से कोठी बनवा कर जिंदगी की सारी सुख सुविधाओ का लाभ उठा सकता था और जिंदगी भर बैठकर खा सकता था,लेकिन अब उससे ये नहीं होता । वो यदि जंगल में कोठी बनवा भी ले तो क्या करता किसे दिखाता , वो केवल उसके लिए होता ।उसका जीवन डोली लूटने के श्राप से ऐसा हो गया था कि सब कुछ होते हुए भी वो अकेला था , उसके साथी तो थे लेकिन वे भी तब तक के ही साथी थे जब तक उसके भुजाओं में बल है । जिस प्रकार किसी व्यक्ति को ढेर सारा धन और यश दे दिया जाए और एक कमरे में बंद कर दिया जाए वो भी अकेला ,तो वह जीवित नहीं रह पाएगा और तड़प- तड़प के मर जाएगा क्योंकि बिना किसी साथी तथा अपनों के कोई अकेले जीवित नहीं रह सकता,उसकी भी हालत इन अथाह धन के साथ ऐसी ही हो चुकी थी । वो ये समस्त धन लेकर समाज में रह नहीं सकता था । समाज में सामान्य जीवन अब उसके नसीब में नहीं था । डाकू दुर्जन सिंह और उसके साथियों ने ना जाने कितनी डोलिया लूटी थी, उन्हीं में से एक उर्मिला की भी डोली थी । डाका पड़ने के तुरंत बाद बारात आई , डकैती का पता चलते ही शादी टूट गई ।एक ही रात्रि में धनवान मुखिया जी गरीब हो गए , अपनी पुत्री के सुनहरे भविष्य की कामना करने वाले पिता उसकी दुर्भाग्य पर रोने लगे । उनका धन लूट चुका था और यही कारण था कि बारात बिना वधू और फेरो के ही वापस चली गई । इस डकैती में मुखिया जी के अलावा और भी बहुत लोगो के आभूषण लूटे गए थे, गनीमत यही थी कि किसीकी जान नहीं गई ।
समय बीतता गया डाकू दुर्जन सिंह ने और भी कई सारी डोलिया लूटी और कई बार पुलिस से आमना - सामना हुआ , घायल हुए और अपने प्रिय साथियों को खोया भी । एक बार एक साहूकार के घर डाका पड़ा , साहूकार के आना कानी करने पर गोलियां चल गई । साहूकार को मार गिराया डाकू दुर्जन सिंह ने , उस डकैती में और भी कुछ लोगो की जान गई । डाका डाल कर लौटते वक़्त गंगा जी के किनारे एक छोटे बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई पड़ी , सरदार रुक गया , बड़ी मुसकत से ढूंढने के बाद उसे गंगा जी के किनारे एक टोकरी में सफेद सी चादर में लिपटीं एक नवजात बच्ची मिली । रात्रि का समय था , इधर उधर पुकारने पर कोई जवाब न मिला । इस सुनसान स्थान पर नवजात शिशु को रोता बिलखता देख उस पाषाण हृदय वाले मनुष्य में भी ममता जाग गई । वो उसे लेकर अपने ठिकाने पर चला गया । बड़ी मुश्किल से उस बच्ची को पिलाने के लिए दुग्ध का इंतजाम हो सका , उसे गरम वस्त्र ओढ़ाए गए तब जाके वो शांत हुई । उसके साथी सरदार की इस करुणामय कार्य पर आश्चर्यचकित हुए , वे डरते हुए सरदार से पूछते है कि क्या करे अब , छोटी सी बच्ची है कैसे पालेंगे हम इसे , यह कार्य बड़ा ही कठिन है हमारे लिए । उनकी बात सुन सरदार ने कहा , हम नहीं पालेंगे इसे वो तो इसकी प्राणों की रक्षा हेतु इसे ले आए वरना रात्रि के अंधेरे में कोई जीव जंतु उसे उठा ले जाता तो यह पाप हमारे मत्थे लग जाता। हम कल प्रातः ही उसे वहीं छोड़ आएंगे जहां से लाए थे ।
निंद्रा आने का नाम नहीं ले रही थी , वो खाट पर पड़ा हुआ बस उस बच्ची के बारे में सोच रहा था और साथ ही उसके मन में कई प्रकार के प्रश्न भी उठ रहे थे -
इस बच्ची का पिता कौन हैं ?
वह इसे इस अवस्था में यहां क्यों छोड़ गए ?
इस दुर्गम स्थान में कोई भूल वस तो नहीं छोड़ेगा अपने बच्चे को ?
इसकी क्या संभावना है कि कल उस स्थान से उसके परिजन उसे ले जाएंगे ?
इस प्रकार के कई प्रश्न उसके मन में सुई की भाँति चुभने लगे ।
दरअसल वो समय ही ऐसा था जब लोग केवल पुत्र की कामना करते थे , पुत्रियों का इस संसार में आना अशुभ मानते थे , लोगो को अपनी वंश वृद्धि के लिए केवल पुत्र की भूमिका को मुख्य माना जाता था ।
सायद दहेज प्रथा इसका कारण हो , दहेज ना देना पड़े यह सोचकर लोग अपनी पुत्रियों को पैदा होते ही मार डालते थे। उन्हे मारने के लिए या तो गंगा जी की लहरों में अर्पित कर देते थे , जहां डूबने से मृत्यु हो जाती थी या फिर इसी प्रकार उन्हें अकेले ऐसे दुर्गम स्थानों पर छोड़ जाते है जहां उनकी मृत्यु हो जाए , वैसे प्यारी सी बच्चियों को मारने के ढेर सारे तरीक़े थे लेकिन उन्हें बचाने का एक भी कारण न था । क्या यह कारण पर्याप्त नहीं है कि हमें राखी बांधने के लिए एक बहन चाहिए , हमे जन्म देने के लिए एक माता चाहिए, हमे विवाह करने के लिए एक युवती चाहिए ।इस प्रकार के कई सारी भूमिकाएं है जीवन में जो बालिकाओं को निभाना पड़ता है , ये सारे कारण तो पर्याप्त होने चाहिए उनके संरक्षण हेतु या तो यह भी हो सकता है कि , पुत्री को पालना उन्हें खर्चीला लगता हो , क्योंकि एक दिन विवाह के पश्चात वो अपने ससुराल चली जाएगी , तो हम क्यों पाले उसे । इससे तो अच्छा होगा कि हमें पुत्र की प्राप्ति हो जो जीवन भर हमारे साथ रह सके , हमारी सेवा कर सके । किन्तु यह समाज यह क्यों भूल जाता है कि बिना पुत्री के पुत्र की प्राप्ति नहीं हो सकती , पुत्री तो जननी है । इस संसार की आधारशिला है पुत्री । जिस प्रकार जीने के लिए जल और वायु दोनों की जरूरत है बिल्कुल उसी प्रकार मनुष्य जाति के उत्थान और वंश वृद्धि के लिए पुत्रियों का भी होना अनिवार्य है । दुर्जन सिंह के मन में उठती प्रश्नों का कोई समाधान नहीं मिला ।
किसी तरह रात्रि बीती , उस नन्ही सी जान को संभालना बड़ा ही कठिन कार्य था , वो रात भर में कई बार उठी और उसे दुग्ध पिलाना पड़ा ,उसके वस्त्र बदलने पड़े । सुबह होते ही सबकी निगाहें सरदार के ऊपर थी , रात भर दुर्जन सिंह के मन में जो युद्ध हुआ वो तो केवल वही जनता था उस भीषण युद्ध में सरदार डाकू दुर्जन सिंह हार गया और दुर्जन सिंह जीत गया , उस भीषण तर्क वितर्क भरी रात्रि में एक डाकू को परास्त होना पड़ा, एक नन्ही सी बच्ची की मोह के आगे । सभी साथियों की जिज्ञासा भरी आंखो को देख सरदार समझ गया था कि उनके मन में उठने वाले प्रश्न क्या है । उनके पूछने से पहले ही सरदार ने एलान कर दिया कि अब ये बच्ची यही रहेगी , हमारे साथ । वे कहते है कि "इस नन्ही सी बच्ची को उसके माता-पिता ने त्याग दिया है , वे उसे लेने कभी नहीं आएंगे और अब मैं उसे त्याग नहीं सकता हूं, हां मगर उसके माता -पिता की तलाश जरूर कर सकता हूं , मिलने पर उन्हें सौंप दूंगा , उन्हें ढेर सारा धन देकर उनकी मती बदल दूंगा और यदि नहीं माने तो उनके प्राण हर लूंगा ।"
सरदार की बातो को काटने की साहस किसी में न थी । सभी साथियों ने उनके निर्णय का स्वागत किया परन्तु इस स्वागत के साथ ढेर सारे प्रश्नों ने भी जन्म लिया , जैसे -
यह छोटी सी बच्ची यहां कैसे रह पाएगी बिना माता के ?
उसका पालन पोषण कैसे होगा इस दुर्गम स्थान पर ?
उनमें से किसीको भी बच्चे पालने का अनुभव नहीं था , कैसे होगा ये सब ?
इस प्रकार के कई सारे प्रश्नों का अंबार उनके समक्ष खड़ा हो गया । साथियों के पूछने पर सरदार ने कहा कि," मैं सब संभाल लूंगा , मै इसे यहां लाया हूं और ये बच्ची मेरी जिम्मेदारी है ।" सरदार ने ये कह तो दिया लेकिन यह कार्य सरल न था क्योंकि सारे डाकू अविवाहित थे , बच्चे पालने का अनुभव नहीं था उन्हें और ऐसे दुर्गम स्थान में वे रहते थे, जहां बच्चा पालना बड़ा ही कठिन कार्य था । एक तो कोई स्त्री नहीं थी वहां जो बच्चे का ख्याल रख सके दूसरी अस्पताल नहीं था समीप यदि बच्ची को कुछ हो जाए तो कहां ले जाएंगे उसे । अब सरदार को उस बच्ची को पालने के लिए किसी गांव में शरण लेनी पड़ती हैं । पहले उस बच्ची का नाम रखा गया चूँकि वो गंगा जी के किनारे मिली थी तो सरदार ने उसका नाम गंगा रख दिया । गंगा के माता-पिता पिता को ढूंढने का बहुत प्रयास हुआ परन्तु वो सारे प्रयास असफल हो गए ।
डाकू दुर्जन सिंह पास के एक गांव में बड़ा ही सामान्य व्यक्ति की तरह रहने लगा , उसने गांव वालो को यह बताया कि ये उनकी अपनी बच्ची है और इसके पैदा होते ही इसकी माता प्रसव पीड़ा ना सह सकी और चल बसी । गांव वालो को कुछ ना कुछ तो बताना ही था वरना वे उन पर सक करने लगते और उनके इस झूठ से आवरण उठ जाता । वह अपने साथ अपने दो विश्वास पात्र मित्रो को ले आए थे , धन की कोई कमी नहीं थी उनके पास लेकिन गांव वालो को दिखाने के लिए उन्होंने खेतो में मजदूरी करना शुरू कर दिया , दिन में खेतो मे काम करते और रात को गंगा के साथ अपने किराए के मकान में रहते । गंगा के देख भाल के लिए हर समय कोई ना कोई उसके साथ सदैव रहता । बिन मां की बच्ची को पालना बड़ा ही कठिन कार्य है , लेकिन दुर्जन सिंह बड़े चाव से यह कार्य करने लगा , कोई परेशानी होने पर पड़ोस की आजी को बुला लेता वो संभाल लेती, वो बिन मां की बच्ची आजी के साथ अच्छी तरह घुल मिल गई और अधिकांश समय उन्ही के घर उनके साथ ही रहती । धीरे-धीरे गंगा बड़ी होने लगी और एक वर्ष की हो गई । विवाहों के लग्न का समय समीप आ गया । सरदार के गुप्तचर साथी उसके पास आकर उसे इस मौसम में होने वाले विवाहों की जानकारी देते है , वे उन्हें ये भी बताते है कि शहर में नया दरोगा आए है लक्ष्मण राय । लक्ष्मण राय से डाकू दुर्जन सिंह का बहुत पहले पाला पड़ चुका था लगभग १० वर्ष पहले जब लक्ष्मण राय सिपाही थे और रामपुर में उनकी पहली तैनाती थी । लक्ष्मण राय काफी होनहार और दिलेर पुलिस वाले थे । एक बार किसी सादी में लूट के वक़्त लक्ष्मण राय और दुर्जन सिंह में बड़ी घमासान लड़ाई हुई थी जिस लड़ाई में लक्ष्मण राय के पिस्तौल से निकली दो गोलियां दुर्जन सिंह के कानों से होती हुई गुजरी थी , बड़े भाग्य से उस दिन उनकी जान बच पाई थी । वहीं लक्ष्मण राय अब दरोगा बन कर चौकी का भार संभालने आए थे ।
ऐसी बात नहीं थी कि सरदार लक्ष्मण राय से डर गए हो ,लेकिन वे अब जीना चाहते थे उस नन्ही सी बच्ची गंगा के लिए , उनके हृदय में एक पिता का अथाह प्रेम जागृत हो चुका था , वे हर समय अपनी पुत्री गंगा के बारे में सोचते , उसके साथ छोटे से बच्चे के भाती खेलते, उसे अपनी हाथो से खिलाते , खेतो से लौटते वक़्त उसके लिए मिठाई लेकर आते । वे अब जीना चाहते थे , मानो अब उनका पितृ प्रेम उन्हें डाका डालने से रोकने लगा । उन्होंने अपने साथियों को कहा कि ,"मै अब ये कार्य नहीं कर पाऊंगा और हो सके तो आप लोग भी ये सब त्याग कर कोई और कार्य करे । "
मशहूर डोली का लुटेरा से ये बात सुनकर उसके साथी स्तब्ध हो गए कि सरदार को ये हो क्या गया , वे १ वर्ष में इतने बदल कैसे गए । खैर उनकी बातो से प्रभावित होकर वे लोग भी डकैती छोड़कर दूसरे सामाजिक कार्य करने लगे । मशहूर डोली का लुटेरा में इतना बड़ा बदलाव और वो भी केवल एक बच्ची की वजह से , ये असाधारण बात नहीं थी । ये तो उस बच्ची के प्रति प्रेम था जिसने पत्थर के हृदय वाला डाकू दुर्जन सिंह के हृदय को कोमल फूल की भाँति सुगंधित और पुलकित कर दिया था । अगले दिन पड़ोस के घर में बारात आने वाली थी और बारात में सम्मिलित होने का नेवता आया । दुर्जन सिंह के लिए ये पहला अनुभव होगा कि जब वे किसी के विवाह में बुलाए गए हो, इससे पहले तो वे बिन बुलाए पहुंच जाते थे और सारा अनुष्ठान भंग कर के चले जाते थे । दुर्जन सिंह काफी खुश थे विवाह में सम्मिलित होने के लिए , विवाह की तैयारी में वे काफी मदद कर देते है । रात्रि होते ही बारात आती है और बारात के साथ वे देखते है कि उनका पुराना बैरी दरोगा लक्ष्मण राय भी आए है अपने ढेर सारे सिपाहियो के साथ, दुर्जन सिंह उन्हें अच्छी तरह पहचान गए लेकिन लक्ष्मण राय उन्हें नहीं पहचान सके क्योंकि जब उनकी भिड़ंत हुई थी तब दुर्जन सिंह का चेहरा ढाका हुआ था । बारातियों से पता चला कि पुलिस को डकैती की सूचना थी इसी वजह से वे बारात में आए है और इस बार पुलिस ने दुर्जन सिंह को पकड़ने के लिए दो तरफा जाल बिछाया है, एक तो बारात में और दूसरा गांव के मरघट के सुन सान रास्ते में घात लगा कर , कहीं से भी दुर्जन सिंह को भाग के जाने का मौका ना दिया जा सके । लेकिन उन्हें क्या मालूम कि डाकू दुर्जन सिंह अब इंसान बन चुका था और उसी समाज में बड़े ही खुशी से सबसे मिलकर, और समाज का एक अहम हिस्सा बनकर रह रहा है ।
दुर्जन सिंह निश्चिंत था क्योंकि वो बारात में आया था न की डकैती करने । विवाह बड़ा ही अच्छे तरह से संपन्न हुआ । सबने खूब खाया , नाच गाना हुआ , लाठी की लड़ाई की प्रतियोगिता हुई । ये सारी चीजे दुर्जन सिंह के लिए बिल्कुल नई थी , उसने विवाह का ये रूप पहले कभी नहीं देखा था , वो तो केवल उड़ता उड़ता आता , वस्त्र आभूषण लूटता , जरूरत पड़ने पर एक आध लोगो की हत्या करता और वापस चला जाता । ये अनुभव उसके लिए बड़ा ही नया और सुखदायक था । विवाह के संपन्न होते ही विदाई की घड़ी आई, विदाई में वधू के घर वालो को रोता बिलखता देख उसे अपनी पुत्री गंगा की याद आई , उसे एका एक ये याद आया कि एक दिन उसकी गंगा का भी विवाह होगा और वो उसे छोड़कर अपने ससुराल चली जाएगी , ये सोचते ही उसकी आंखे आसुओं से भर गई । मानो ये आंसू उसकी मलिन हुए आत्मा को स्वच्छ कर रही थी । डोली का लुटेरा बन उसने कई सारी डोलिया लूटी, ना जाने कितनी सारी बेटियों का गहना लूटा , कितनी सारी हत्याएं की , उस धन का क्या लाभ आखिर वो खेतो में मजदूरी कर अपनी जीविका चला रहा है । उसकी आंखो से आसू सावन की बारिश की तरह बहती चली गई , मानो वो आंसू उसकी मलिन आत्मा को धीरे-धीरे स्वच्छ करती जा रही हो । डाकू दुर्जन सिंह वैसे तो अनगिनत बारात में आया था जहां से वो असंख्य दौलत लेकर लौटा लेकिन आज इस बारात में एक पिता बने दुर्जन सिंह को ऐसी सम्पत्ति मिली जिसने उसका सारा पाप धो डाला । उसे ये एहसास हो गया था कि किसी पुत्री के पिता के लिए उसकी पुत्री का विवाह कितना महत्वपूर्ण होता है , बस इसी दिन के लिए एक पिता अपनी सारी जीवन की पूंजी लुटा देता है । फिर भी वो पिता पुत्री से बिछड़ने का शोक मनाता है नाकि पुत्री के साथ जाने वाले धन का । कितना पवित्र है ये विवाह का संस्कार जिसे वो कलंकित और खंडित कर चला जाता था । एका एक उसे उन सभी बच्चियों का स्मरण हो उठा जिनकी डोली उसने लूटी थी , उनमें से कितनो का विवाह टूट गया , कितनो को लूट के कारण धनहीन हुए माता-पिता विवश होकर अयोग्य वर से विवाह कर दिए होंगे , यह सब सोच- सोच कर दुर्जन सिंह के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे । जितने आँसू गिरे उतने उसके पाप को धोते हुए उसके मलिन आत्मा को स्वच्छ करती गई । इस विवाह में सम्मिलित होकर दुर्जन सिंह ने खुद को पूरी तरह स्वच्छ कर लिया । वह घर लौटा अपनी पुत्री गंगा को निहारता रहा और ईश्वर का धन्यवाद् करता रहा कि अगर उन्हें ये बच्ची नहीं मिलती तो उन्हें ये सब ज्ञान कभी ना होता और वे राक्षस बनकर पुलिस की किसी ना किसी गोली का शिकार बन जाते । रात भर निंद्रा नहीं आयी उन्हें ।
अगले दिन प्रातः उठते ही उन्होंने अपनी समस्त साथियों को इकट्ठा किया और अपने अड्डा पर पहुंचे , वहा जाकर उन्होने साथियों को समझाया कि हम जो कर रहे थे वो कदाचित गलत था , हमने बहुत बुरे कर्म किए और इन कर्मो के लिए हमारा नर्क जाना निश्चित है । हमारे पास एक मौका है अपनी गलतियों को सुधारने के और वो ये हैं कि सबसे पहले ये प्रण लें कि ये काम हमेशा के लिए छोड़ दें , अपने द्वारा लूटी गई सारी सम्पत्ति को गरीब और निर्धन लोगों की पुत्रियों के विवाह में सहयोग हेतु दान कर दे और समाज में एक सामान्य व्यक्ति की तरह जीवन यापन कर सामाजिक कार्यों में लोगो की मदद करे, इन्हीं कर्मो से हम अपने पाप को धो सकते है । ये सब कहते हुए सरदार के आंखो में आसू थे , वे रोते रोते ये सब कह रहे थे , सरदार को पहली बार रोते हुए देखा उनके साथियों ने और उन्हें भी ये आभास हो चुका था कि वे पाप के मार्ग पर थे , उन्होंने कई सारी सम्पत्ति अर्जित की लेकिन पुलिस से भागे- भागे फिरते थे , जंगल में वास करते थे तथा उन लूटी हुई सम्पत्ति का कभी उपयोग नहीं कर पाए फिर क्या लाभ । उन्होंने सरदार के समर्थन में हाथ उठा दिए और लूटी हुई सारी सम्पत्ति को गरीब और निर्धन लोगों की पुत्रियों के विवाह में दान करने का प्रण लिया और सारी सम्पत्ति एक दूसरे में बाँटकर वहां से हमेशा हमेशा के लिए चले गए । सरदार के कहे अनुसार सारी सम्पत्ति को पूर्णतः गरीब और निर्धन लोगों की पुत्रियों के विवाह में दान कर दिया गया ।
कई वर्ष बीत गए , गंगा अब १८ वर्ष की हो चली थी , उसकी विवाह की तैयारी चल रही है , गंगा के विवाह में दुर्जन सिंह के समस्त साथी सम्मिलित हुए । गंगा उन सब के लिए पुत्री समान थी और अत्यंत ही प्रिय थी। गंगा का उन सबके जीवन में आने के बाद ही उनका जीवन सफल हुआ , वे सारे गंगा के ऋणी थे । बड़े ही धूमधाम से गंगा की शादी हुई और उसकी विवाह का सारा खर्च उसके पिता दुर्जन सिंह के स्रम द्वारा अर्जित किए गए धन से हुआ । विवाह संपन्न हुई , गंगा दुर्जन सिंह को अकेला छोड़ अपने ससुराल चली गई । गंगा की डोली को जाता देख दुर्जन सिंह को वो सारी बीती हुई बाते याद आने लगी , कैसे गंगा उन्हें मिली थी , उसका पालन पोषण , उसकी तोतली जुबान से बाबा पुकारना , उसका बाबा के लिए फिक्र करना । ये सारे बीते हुए लम्हे उसके आंखो के सामने चित्रपट हो रही थी , उनकी आंखो से अश्रु बह रहे थे और चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी । घर के दहलीज पर बैठे -बैठे मुस्कुराते हुए वो ये सब देख रहा था , उसका ह्रदय अपनी पुत्री से बिछड़ने के गम में अत्यंत ही तेजी से धड़कने लगा और धड़कते धड़कते सदा के लिए शांत हो गया ,उसके प्राण पखेरू उड़ गए । एक डोली का लुटेरा से आदर्श पिता बने दुर्जन सिंह को इससे अच्छी मृत्यु मिल ही नहीं सकती थी । वो अपने मिट्टी के शरीर को इस धरती पर छोड़ कर परलोक भ्रमण पर निकल गया ।
धन्यवाद् ।।


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