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कविता: भारत कल और आज (रीमा सिंह, भोपाल, मध्य प्रदेश)

 

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंस" से प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिका" के वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार रीमा सिंह की एक कविता  जिसका शीर्षक है भारत कल और आज":

आजाद देश हो अपना,

सबका  था  ये   सपना,

कल भी तिरंगा अपना,

आज भी है ये अपना।

 

पहले दिवाली दीयों से,

अब टंग रही है लड़ियाँ,

भारत माँ के गले हार

पहले पड़ी थी बेड़ियाँ।

 

राजतन्त्र फिर लोकतन्त्र

कितना  बड़ा  है  अंतर,

वही ताज है,लालकिला है

वही  है  जंतर-मंतर।

 

बदला देश नहीं अपना,

बदली विचार धारा है,

वही धरा है, वही है सूरज,

वही तो चांद तारा है।

 

बढा़ ज्ञान कम हुई,

संस्कृति सभ्यता हैं,

वही रामायण,कुरान,

बाइबल व गीता है।

 

हरियाली को तरसे मन,

नहीं तुलसी अब आँगन,

यहीं  है  मथुरा  यहीं है ,

काशी यहीं तो है वृंदावन।

 

तन ढके थे, खुले थे मन,

अब हो गया विपरीत,

वही है मौसम वही त्योहार,

बस रही ना वैसी प्रीत।

 

भरी  पड़ी हैं  गाथायें

वीरांगना  बलिदानों से,

फिर क्यूं? खेलते हो,

बहू बेटी के सम्मानों से।

 

नतमस्तक हैं विज्ञान,

के अचूक प्रयोगों पर,

लगाते थे जब लोग सतक,

आज रोक नहीं रोगों पर।

 

पहले हुआ करते थे घर,

अब बन रहे मकान,

सगे संबंधी बिछड़ रहे,

अब कम हो रहा ईमान।।

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