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कविता: त्याग का तीखा चखते हैं (कुमुद अनुन्जया, भ्रमरपुर, भागलपुर, बिहार)


पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंस" से प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिका" के वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार कुमुद अनुन्जया की एक कविता  जिसका शीर्षक है त्याग का तीखा चखते हैं":

बहुत चख लिया,

शहद स्वाद स्वतंत्रता का,

चलो अब कुछ,

त्याग का तीखा चखते हैं

 

बहुत हो गया

केवल लेना लेना,

चलो आज. फिर

अपनी  मातृभूमि तर,

अपने पुरखों की तरह,

सर्वस्व निछावर करते है।

 

अब बस!

बहुत कोस लिया हमने,

राजनीति व्यवस्था और तंत्र को,

चलो आज फिर,

अपने अंर्तमन के दर्पण मे.

अपने हिस्से के योगदान का,

वास्तविक आकलन और दर्शन करते हैं।

बहुत चख लिया

शहद स्वाद स्वतंत्रता का,

आज कुछ त्याग का तीखा चखते हैं

 

बहुत मना चुके हम

मातम मानवता के मृत्यु का,

उठ जाग मनुज |

भागीरथ के वंशज,

भारत भूमि पर आज फिर,

प्रेम दया करुणा की गंगा को

लाते हैं।


बहुत चख लिया

शहद  स्वाद स्वतंत्रता का,

चलो अब कुछ

त्याग का तीखा चखते हैं।

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