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लघुकथा: गांधी ओर मजबूरी (डॉ. विशाल सिंह 'वात्सल्य', राजीव कालोनी, डीग, भरतपुर, राजस्थान)

 

 पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार डॉ. विशाल सिंह 'वात्सल्य' की एक लघुकथा  जिसका शीर्षक है गांधी ओर मजबूरी":

"इस लड़के का समझ में नहीं आता हर समय फालतू बात है।".... "क्या हुआ?" रश्मि ने पूछा। "तुम्हारा लाडला, इस पर एक ही बात है। आपने मेरे लिए क्या किया?, उसने क्या किया?, इस देश ने क्या किया? इसे बताओ यह जो आज उन्मुक्त घूम रहा है यही स्वतंत्रता पाने के लिए ना जाने कितने लोगों ने अपना बलिदान दिया है।"

" रुको रुको, अब तुम फिर गांधी पुराण लेकर मत बैठ जाना बहुत बार सुन चुकी हूँ। मजबूरी है जो हम मां बेटों को तुम्हारे साथ रहना पड़ रहा है। क्या करें, मजबूरी का नाम महात्मा गांधी है।" " वाह... वाह" रोहन ने रश्मि को बीच में टोका। "यह तो गलत बात हुई अपनी बात कहने के लिए गांधी जी का सहारा ले लिया ओर गांधी जी कभी मजबूर नहीं थे। तुम लोग अपनी कमजोरी छुपाने के लिए उस शक्तिशाली व्यक्ति का सहारा लेते हो। अब यह मत कहना, वो हाड मास का पुतला शक्तिशाली कैसे था। वह शक्तिशाली था, क्योंकि उसमें आत्मिक शक्ति का भंडार था। उनकी आत्मा परमात्मा से साक्षात्कार करती थी। उनका मन सभी के लिए निर्मल था। उनके दिल मे हर जाति, धर्म, रंग, वर्ण के लिए सम्मान और प्यार था। उनको समझने के लिए उनके जैसा होना आवश्यक है। आज जिसको देखो वह गांधीवाद की टोपी पहनकर घूम रहा है। मात्र अपने निजी स्वार्थों के लिए। गांधी बनना आसान नहीं है, हर कोई गांधी नहीं बन सकता। उसके लिए त्याग करना पड़ता है। उनका त्याग, उसकी कमजोरी नहीं थी। वो चाहते तो सूट- बूट पहनकर आरामदायक जिंदगी व्यतीत कर सकते थे पर नहीं वह ईश्वर का दूत थे। उन्होने वही किया जो एक ईश्वर करता है, सभी को स्वतंत्रता व सम्मान दिलाने के लिए उन्होने सत्य के मार्ग पर चलते हुए युद्ध लड़ा और जब उसके युद्ध में असत्य व हिंसा ने प्रवेश कर लिया तो उन्हें रुक जाना पड़ा। मेरे गांधी कभी कमजोर नहीं थे। तुम लोग अपनी कमजोरी छुपाने के लिए उनका सहारा मत लिया करो।" ऐसा कहकर रोहन घर से बाहर निकल जाता है और रश्मि अवाक रह जाती है।

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