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कविता: आजाद तो है! (शिबानी प्रसाद, नागराकाट, जलपाईगुड़ी, पश्चिम बंगाल)

 

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंस" से प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिका" के वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार शिबानी प्रसाद की एक कविता  जिसका शीर्षक है आजाद तो है!":

आजाद है हम

आजाद हो तुम

देखो सब आजाद तो है

फिर रुदन किस बात का है?

न जाने किस घात का है?

चुप रहो, करो नहीं विलाप तुम

नेता खड़े हैं न

संदेह किस रात का है?

74वें साल की हुई,

आजादी अपनी

फिर डर किस बात का है?

 

आजादी अगर ऐसी मिले तो

बांध कर ही रखो इसे तुम

ओढ़ लो कफ़न ऐसे कि

कुछ भी नहीं, देख सको तुम

मलवा भर कर रखा है मन में

फिर दिखावा ये किस, जात का है?

74वें साल की हुई

आजादी अपनी

फिर डर किस बात का है?

 

सैलाब बस अभी थमा है

तबाही कि तो तैयारी है

मार पीट भी हो सकती हैं देख लो,

तुम्हारी थोड़ी कोई जिम्मेदारी है?

आजादी लेकर क्या करोगे?

मरना ऐसे भी हैं ,

वैसे भी मरोगे

मांग लो जो चाहिए तुमको

भारत तो अपने बाप का है?

74वें साल की हुई

आजादी अपनी

फिर डर किस बात का है?

 

भारत के तो लाल हो तुम न

तो कर लो कुछ,

काम कही से

और कुछ न दे पाये तो क्या

वफा ही दे जाओं सही से

ये गर्भ कि ही बात तो है

74वें साल की हुई

आजादी अपनी

फिर डर किस बात का है?

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