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कविता: भरोसे का खून (राजीव रंजन, गया, बिहार)

 

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंस" से प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिका" के वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार राजीव रंजन की एक कविता जिसका शीर्षक है "भरोसे का खून":

जो कहती थी —
प्यार में हद से गुजर जाऊँगी,
आपके लिए कुछ भी कर जाऊँगी ।
हमें भूलियेगा नहीं 'राजीव' वर्णा,
मैं आपके बिना मर जाऊंगी ।

आपके इश्क़ का मुझपर छाया है सुरूर,
हम दिल से एक हैं भले हैं दूर-दूर।
ऐसा नहीं है कि मैं नहीं चाहती आपसे मिलना,
पर आप समझते नहीं हैं 'राजीव' मैं हूँ मजबूर।

उसने कहा क्या आपको मुझपर विश्वास नहीं ?
या मैं आपके दिल के पास नहीं ?
मैंने कहा तुमसे बढ़कर तो मेरा कोई खास नहीं। 
तुम्हारे बिना मुझे आता कुछ भी रास नहीं। 
बिन तेरे इस दिल में खुदा का भी बास नहीं। 
तुम्हें भूलकर मैं ले सकता साँस नहीं।

जिसके लिए मैंने अपने दोस्तों को छोड़ा,
उसने ही यारों मेरा नन्हा सा दिल तोड़ा,
अब तो अपना ये हाल है, 
जी रहा हूँ थोड़ा-थोड़ा,मर रहा हूँ थोड़ा-थोड़ा।

होती थी बातें तो मिलता था सुकून,
छा गया था मुझपर इश्क़ का जुनून।
खुद से ज्यादा भरोसा किया था मैंने,

कर दिया उसने भरोसे का खून। 

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