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कविता: आ..ज़ा..दी.. का पुत्र (पुष्कर बन्धु, हैदराबाद, तेलंगाना)

 

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार पुष्कर बन्धु की एक कविता  जिसका शीर्षक है “आ..ज़ा..दी.. का पुत्र":

आज़ादी

चलते चलते आज मैं 73 वर्ष का बूढ़ा हो चुका हु

मेरा भाई जो मुझसे एक दिन बड़ा है

निश्चित!

इसी अवस्था मे होगा

भाई! न जाने कितने युद्ध देखे है हमने

न जाने कितनी लाशे दफ़न है सीने मे हमारे

घात लगाये खड़े रहते हो तुम

तो पहरा देता हूँ मैं भी यहाँ कि

परिंदा भी न आए मेरी सीमा मे

एक पहरेदार की भाँति

पहरेदार..?

राष्ट्र का चोला पहने उन राजनेताओं के

जो हमारी सर कटी लाशो से अपनी राजनीति चमकाते है

एक ही उदर ने निकलकर

शरीर से अलग दो टुकड़ों में बट आज हम पड़ोसी हो के रह गए

नुसरत जिसके 'सांसों की माला' ने पिरोया था हमें

जॉन फ़ैज़ जो मेरी पिठ पर खेले थे

आज तुम्हारे खून (हिस्से) हो गए

भाई! अबकी फसलों मे ऐसी बीज न बोना

जो अपनी ही संतानों को रक्तरंजित करने आमादा हो जाए

अब क्या कहु

पीड़ित हूँ

भुखमरी से बेरोजगारी से लाचारी से

घिरा हूँ

धर्माधीशो व्यभिचारियों भ्रष्ट चारो से

और तुम भी जुझ रहे होगे इन्ही बीमारियों से

जानता हूँ

पर ठाना हूँ

अबकी दिवाली आऊंगा बताशे लेने तुम्हारे घर

तुम भी तोड़ ले जाना यहां से ईद की ईख

पर चेत रहे

एक फरमान पे रखना

अपनी तलवार की नोक गर्दन पे मेरे हमेशा

क्योंकि मैं भी उतार दूंगा गोलीयाँ सीने में तुम्हारे

और पा जाऊँगा कोई चक्र

तभी वे करेंगे मेरा श्रार्द्ध, देंगे सलामी औ'

कहेंगे मुझे

आ..ज़ा..दी का पुत्र

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