पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंस" से प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिका" के वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार मंगला श्रीवास्तव की एक कविता जिसका शीर्षक है “माँ की ललकार":
बेटा आज तक मैंने
तुझको सम्भाला अब
आज तेरी बारी है
देश पर आज आई आफत ये भारी है।
जा मेँ तिलक तेरा करती हूँ
सीने पर अपने मेँ पत्थर रखती हूँ।
ये देश तुम्हारां है ये
मातृभूमि तुम्हारी है
इसकी रक्षा करने की
अब बारी तुम्हारी है
अपने खून का एक एक
कतरा चाहें बहा देना
अपने तिरंगे की शान
और लाज तू बचा लेना।
पीठ ना दिखाना कभी ये
मैंने तुझको कसम डाली है
आज देश को बचानें
की तेरी बारी है।
शत्रुओं को तुम चुन चुन कर मारना
वो हावी ना हो देश पर ये तुम जानना।
सीमा पर जाओं तुम
और ये कसम खाओं तुम
एक एक दुष्टोँ को तुम
खदेड़ कर जब तक
ना भगाओगें तब तक
चैन की सांस ना लोगें
और ना घर आओगे।
शहीद होजाओगें तो मुझकों
गर्व होगा तुम पर
मेरा लाल आज लिपटा है
अपने शान तिरंगे पर
मातृभूमि के कर्ज तुम चुकाओगें
अपने खून की हर एक बूंद से
जब तुम उसको निहलाओगें।
जाओं भेज रही हूँ तुमको
देश की रखवाली को
पीछे ना हटना कभी अपनी
जिम्मेदारी सें डटे रहना तुम
सीमा पर देश की रखवाली को।


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