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कविता: 70 की उम्र का Digital Love (चंद्रकला भरतिया, नागपुर, महाराष्ट्र)

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार चंद्रकला भरतिया की एक कविता  जिसका शीर्षक है “70 की उम्र का Digital Love”:

घर की विपरीत परिस्थिति मे

मान चुनौती जीवन को

ठान लिया था हार नही मानूंगी

भरकर जोश,आगे बढ ही जाऊंगी

 

सीखा मनोयोग से मोबाइल दादीने।

चलाकर'की'बोरड पर ऊँगलिया

कंपकंपाते हाथो की,चतुराई से

बनाया फेसबुक पर, एक दोस्त दादी ने।।

 

बदल गया अब दादी का जीवन है

घंटो बाते  वे  करती  है। सुबह

दोपहर, शाम और रात

मस्त रहती वे अपने ही मे आप।।

 

हंसती,खिलखिलाती,गुनगुनाती है

लगता जैसे जंग  जीत  ली है।

उम्र भी धोखा  खा गई हैं ।

दादी 'पचपन'की अब लग रहीहै।

 

बदला दादी का जीवन औ' व्यवहार 

अचंभित है परिजन सारे

मिटाया सबने बैर-भाव है ।

मिलजुल रहते वे अब सारे ।।

 

खुशियो को लग गए पंख है

दोस्त ने कर दी करामात है।

अनमोल 'रतन' दोस्त होते है ।

बडे भाग्य  से ये मिलते है ।।

 

कहती 'चन्दा 'इनका जतन करो

प्राणो से अधिक इनको प्यार करो।।

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