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कविता: शरद पूर्णिमा का चांद (महेन्द्र सिंह 'राज', मैढीं, चन्दौली, उत्तर प्रदेश)

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार महेन्द्र सिंह 'राज' की एक कविता  जिसका शीर्षक है “शरद पूर्णिमा का चांद”: 

आज का चांद पूरी जवानी पे है

नभ के तारे भी पूरी रवानी पे हैं

भू से अम्बर तक आलोक फैला इस कदर

मानो चांद उगा आज  सिन्धु... पानी पे है।

 

चाँद रहता है  अम्बर में, मगर उसकी चांदनी

आके चुपके  से धरा को  है करती  प्रकाशित

ये यूं  ही  नहीं   चाँद  व्याकुल  धरा  के  लिए

मां पुत्रका सम्बन्ध इसलिए करता आलोकित।

 

खुद  का आलोक  अपना नहीं चांद में

कर्ज लेता है  कुछ आलोक भास्कर से

अपने  भूखा  रहे  फिर भी देता है हवि

अपनी माताधरा को अपने कुंज कर से।

 

ये  चन्द्रमा जड  हो  करके भी कितना

 खयाल रखता है निज माता का सदा

हमको सिखाता रहो मुश्किलमें फिरभी

रखो  ध्यान अपने माता पिता का सदा।

 

माना  भाई  है  उसका  हलाहल जहर

दोनों  निकले हैं  एकी  अतल सिंधु से

प्रकृति  में  दोनों  के अन्तर  असीमित

ना  तुलना  है  कोई  विष  का  इन्दु से।

 

यदि बनना है तुमको कुछ तो इन्दु बनो

बन के  विष धरा पे ढावो ना तुम कहर

उर अन्तर  में भरो  आलोक चंद्रमा  सा

छल  कपट  धूर्तता  का  ना बोवो जहर।

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