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कविता :: मैं अकेला हूं || अर्चना होता, सम्बलपुर, ओड़िशा ||

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के
 "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार अर्चना होता की एक कविता  जिसका शीर्षक है “मैं अकेला हूं”:
 
"जब भी किसी फूल को देखा है मुस्कुरा हुए
याद आते हैं वो दिन,
जब हम अपनों के करीब थे
बुने थे सपने हजार,
सजाया था ख्वाबों का महल
था ये यकीन मुझे वो करेगा इंतजार मेरा
हर मोड़ पे ,हर राह पे
पर हमें क्या पता था
वो चले जाएंगे हमें यूं तन्हा छोड़ कर,
उस फूल की तरह,
जो कभी इस बगिया में खिला था
उसकी खुशबू से महक उठा था चमन सारा
उसे भी यह भ्रम था,
मैं भी कभी ना जुदा होऊंगा इस डाल से
पर उसका सोचना भी रह गया अधूरा
एक दिन एक अजनबी ने कहा
ले जाऊंगा इसे तोड़कर,
सजाऊंगा अपना चमन मैं
आज मैं अकेला हो गया ……..
और वो फूल भी रह गया बिल्कुल अकेला
आज मैं अकेला हो गया…………… ।"

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