पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद
पब्लिकेशंस" से प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल
फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद
हिंदी ई-पत्रिका" के वेब पोर्टल पर आपका स्वागत
है। आज
आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार पृथ्वी राज कुम्हार की एक कविता जिसका
शीर्षक है “तीसरी दुनिया”:
गोमुत्र की खुशबू भूल गई
वो फोग छिड़कने लग गई
मोबाइल कंठी माला हो गई
यह दुनिया तीसरी हो गई।
भूल गई है वो
तुलसी पूजन,
रहती मुंह पर
उसके सूजन,
जरा पूजा-पाठ की
क्या कहा,
वह सुपर्णखा सी
हो गई।
बिजली से चलने लग
गई,
मोहताज विद्युत
की हो गई,
करंट से रोटी पक
गई,
यह दुनिया तीसरी
हो गई।
मोबाइल की यह
जिंदगी हो गई,
प्रेम से रहना भी
बंदगी हो गई,
ऐसे ही सुबह से
शाम हो गई,
यह दुनिया तीसरी
हो गई।
गोमुत्र की खुशबू भूल गई
वो फोग छिड़कने लग गई
मोबाइल कंठी माला हो गई
यह दुनिया तीसरी हो गई।


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