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कविता: बदलते सफर (दुर्गादत पाण्डेय, वाराणसी, उत्तर प्रदेश)

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के
 "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार दुर्गादत पाण्डेय की एक कविता  जिसका शीर्षक है “बदलते सफर”:

वो ऊंचे आसमान को बता दे तू
तू कितना है, बलवान
ये दिखा दे तू,
धरा क्या, धरा के ऊपर आसमां में
कितनी है, खिलाफतें
उन्हें मिटा दे तू
 
महासागर के, अथाह जल को
कुछ पल के लिए, रुका दे तू
तू आ रहा, रहें ढूढ़ने
समंदर को, खुलकर बता दे तू
 
नफरतों को कही दूर, पगडंडियों
में, पूरी तरह
ठहरा दे तू
अपनी सफलता का, परचम
सदियों तक फहरा दे तू
 
दर - दर भटकना छोड़कर,
इन अंधेरों में खुद चलना, जता दे तू
सफर ए मंजिलों के, रोडों को
अपने जज्बे से, हटा दे तू
 
धुएं की गहराइयों को
आग, अब बना दे तू
इन्ही अंगारों, पे हर - पल चलके
सफर को आसान बना दे तू !!

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