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कविता: प्रेम का सौदा (मोहन लाल सिंह, सिकटिया, सारठ, देवघर, झारखंड)

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के
 "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार मोहन लाल सिंह की एक कविता  जिसका शीर्षक है “प्रेम का सौदा”:
 
दो अनजानी पथिक
कालेज में पढ़ते ।।
एक गलियों का राजा
दूजा महलों की रानी ।।
धधक उठे प्रेम राग दिल में
दोनों ने करने लगी मनमानी ।।
इश्क ही मंदिर इश्क ही मस्जिद इश्क इबादत ,गुरुवाणी ।।
इश्क इश्क की चली आँधिया
पथ विहिन होकर जानी ।।
इश्क हो गया तब एक दूजे
ने हैसियत पहचानी ।।
इश्क के रंग रंग-बिरंगे सपने
पालने लगे एक दूजे मन में ।।
सपनों को साकार के लिए
गलियों के राजा ने मन में ठानी ।।
चल पड़े ऐश्वर्य कमाने
माया नगरी जाने की ठानी ।।
वहाँ खरीदकर एक टेम्पो से
चार साल में 40 हजार तक ही
जमा कर पाया ।।
इस बीच इश्क के रानी की
शादी-ब्याह के लिए पिता ने ठानी ।।
रईश घर में सम्बन्ध तय किया
तब रानी ने जानी ।।
फिर प्रेम के दिवाने को बुलाया
शतॅ रखी मनमानी ।।
40 हजार सिर्फ शादी के लिए
बाद का क्या होगा जानी ।।
मुझे चाहिए सैर-सपाटे
धन दौलत और शोहरत ।।
मेरी शादी तय हो गई
रईश जादे के यहाँ जानी ।।
जिसके पास नहीं है पैसा
इश्क कहीं क्या उसका होता ।।
इश्क आज बाजार में बिकता
इश्क के रंग में पागल होता ।।
इश्क आग है लोग जानकर
जलता, फिर करता मनमानी ।।
जार जार बेजार हुआ दिल
तार तार तकरार हुआ दिल ।।
दो बार कोई प्रेम क्यों करते
प्रेम आज बाजार हुआ दिल ।
गलियों के राजा कहता था
प्रेम का सागर इश्क की रानी ।।
एक नीला समुद्र सा था दिल
एक था चाँद तारे नील गगन दिल ।।
कहाँ गया दिल कैसा हो गया
आज तो बाजार हुआ दिल ।।
बिक गए सारे अरमानों ले
प्रेम का सौदा हुआ दिल

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