पश्चिम
बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद
पब्लिकेशंस" से प्रकाशित होने वाली
सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिका" के वेब पोर्टल पर आपका स्वागत
है। आज आपके सामने प्रस्तुत है
रचनाकार राजीव भारती की एक कविता जिसका
शीर्षक है “फूल और कांटे .....”:
ताउम्र हम कांटों को
देखते रह गए और
बिता दी वक्त, उन्हें गिनते हुए
न सोंचा, न महसूस की
जरुरत इस बात की
कि कांटों के बीच
खिले हैं, सुन्दर फूल गुलाब के
कैसे नजरअंदाज हमने
कर दिया ,
और वक्त यूं ही गुज़र गये
काश, कांटे गिनने के बजाय
सुन्दर गुलाब को देख लिया होता
तो, खूबसूरती से मन प्रसन्न हो गया होता
और जीवन धन्य हो गया होता
पर, जीवन में
सिर्फ फूल नहीं होते साहब!
फूल के साथ शूल भी होते हैं
जीवन की यह कड़वी सच्चाई है
कि सुख के साथ दुःख भी होते हैं
यही हक़ीक़त है
काश! इस बात को पहले ही
समझ गया होता
तो, आज़ जिन्दगी का
हश्र कुछ और ही होता
पर, हमारे सोचने से क्या होता है
होता तो वही है जो
रब को मंजूर होता है ।
ताउम्र हम कांटों को
देखते रह गए और
बिता दी वक्त, उन्हें गिनते हुए
न सोंचा, न महसूस की
जरुरत इस बात की
कि कांटों के बीच
खिले हैं, सुन्दर फूल गुलाब के
कैसे नजरअंदाज हमने
कर दिया ,
काश, कांटे गिनने के बजाय
सुन्दर गुलाब को देख लिया होता
तो, खूबसूरती से मन प्रसन्न हो गया होता
और जीवन धन्य हो गया होता
पर, जीवन में
सिर्फ फूल नहीं होते साहब!
फूल के साथ शूल भी होते हैं
जीवन की यह कड़वी सच्चाई है
कि सुख के साथ दुःख भी होते हैं
यही हक़ीक़त है
काश! इस बात को पहले ही
समझ गया होता
तो, आज़ जिन्दगी का
हश्र कुछ और ही होता
पर, हमारे सोचने से क्या होता है
होता तो वही है जो
रब को मंजूर होता है ।


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