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कविता: आदिवासी अदावत (बिक्रम साव, कोलकाता, पश्चिम बंगाल)

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के
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जो बरसों से सींचा हमने धरती और पहाड़ों को,
उखाड़ फेंक दी तुमने, हमारे उन जज़्बातों को।
पेड़ लगाए हमने, सिखाया पेड़ की तरह प्रेम करना,
पेड़ों को ही काट दिए तुम, करने लगे ईमारतों की स्थापना।
आए दिन हिडमा मरती, मंगरा कोसती, सोमरा चिल्लाता,
लगाकर नक्सली का ठप्पा, गोलियाँ उनपर बेसुमार बरसाता।
पुलिस जंगल की भाषा नहीं समझती,
आदिवासी पुलिस की भाषा नहीं समझते,
और आखिर में दौड़ भागने पर, कर दिए जाते कत्ल।
बादल, बारिश, तूफान, भूकम्प को भांप लेने वाले लोग,
जल, जंगल, ज़मीन की लड़ाई लड़ने वाले लोग।
यह अदावत, यह आग कभी बुझेगी नहीं,
यह सत्ता का शोषण,
यह विकास का प्रपंच,
उनकी संपत्ति को हड़प लेने की कोशिशें,
उनके अधिकारों का हनन
अब समाप्त होंगे जरूर,
यह अदावत  उनके मृत्यु के साथ ही ख़त्म नहीं होगी,
यह आदिवासी अदावत, अनंत काल तक चलेगी।

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