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गीत: लावणी (ललिता शर्मा 'नयास्था', भीलवाड़ा, राजस्थान )

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार ललिता शर्मा 'नयास्था' का एक गीत  जिसका शीर्षक है “लावणी”:

मैं शब्दों का हूँ सौदागर , भावों को तौल रहा हूँ।

आज लहू से मन की गाँठें , धीरे-से खोल रहा हूँ।।

 

छंद-अलंकारों की भाषा , न करूँ मंचों की आशा।

तन की बातें समझूँ मन से , अंतर्मन की परिभाषा।

मीठी यादें अपने भीतर , होले-से घोल रहा हूँ।

आज लहू से मन की गाँठें , धीरे-से खोल रहा हूँ।।

 

जीवन-पथ पर चलता साथी,संग दिया जैसे बाती।

वाणी मधुमय रस बरसाती, कंठ सदा ही मितभाषी ।

खट्टे-मीठे अनुभव के ही , फिर समय टटोल रहा हूँ ।

आज लहू से मन की गाँठें , धीरे-से खोल रहा हूँ।।

 

जैसी हो शब्दों की टोली , वैसी बनती हमजोली।

संगी-साथी तब तक अपने , जब तक बात पते की बोली ।

मैं शब्दों के भावों से ही , वर्णों को मौल रहा हूँ ।

आज लहू से मन की गाँठें , धीरे-से खोल रहा हूँ।।

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