पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंस" से प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिका" के वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार ललिता शर्मा 'नयास्था' का एक गीत जिसका शीर्षक है “लावणी”:
मैं शब्दों का
हूँ सौदागर , भावों को तौल रहा हूँ।
आज लहू से मन की
गाँठें , धीरे-से खोल रहा हूँ।।
छंद-अलंकारों की
भाषा , न करूँ मंचों की आशा।
तन की बातें
समझूँ मन से , अंतर्मन की परिभाषा।
मीठी यादें अपने
भीतर , होले-से घोल रहा हूँ।
आज लहू से मन की
गाँठें , धीरे-से खोल रहा हूँ।।
जीवन-पथ पर चलता
साथी,संग दिया जैसे बाती।
वाणी मधुमय रस
बरसाती, कंठ सदा ही मितभाषी ।
खट्टे-मीठे अनुभव
के ही , फिर समय टटोल रहा हूँ ।
आज लहू से मन की
गाँठें , धीरे-से खोल रहा हूँ।।
जैसी हो शब्दों
की टोली , वैसी बनती हमजोली।
संगी-साथी तब तक
अपने , जब तक बात पते की बोली ।
मैं शब्दों के
भावों से ही , वर्णों को मौल रहा हूँ ।
आज लहू से मन की
गाँठें , धीरे-से खोल रहा हूँ।।


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