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कविता: गीत मैं कैसे गाऊं (वीणा गुप्त, नई दिल्ली)

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार वीणा गुप्त की एक कविता  जिसका शीर्षक है “गीत मैं कैसे गाऊं”: 

बता लेखनी मेरी मुझको

गीत मैं कैसे गाऊँ?

भूखे -सिसके प्राण हैं जिनके,

चूर-चूर अरमान हैं जिनके।

उछल-कूद तो बात दूर की,

लुंठित सब उत्थान हैं जिनके।

दीन-हीन कातर नयनों की

भाषा मैं किसे पढ़ाऊँ?

 

बता लेखनी मेरी मुझको,

गीत मैं कैसे गाऊँ?

 

धरा हुई शोणित से लोहित

मंदिर से भगवान् तिरोहित।

आदमी से इंसान लुप्त है,

सूर्य सभी अवसान हो रहे।

गति के सब प्रतिमान खो रहे।

छलना के झंझावातों में

मैं कैसे जोत जगाऊँ।

 

बता लेखनी मेरी ,मुझको

गीत मैं कैसे गाऊँ?

 

दीप रक्त के जला- जलाकर

अपना सब सर्वस्व लुटाकर,

वज्र प्रहार सह कर छाती पर,

कदम रुके न जिनके पल भर

देश प्रेम की पुण्य डगर पर,

हुए निछावर पुष्प जो अनगिन,

मैं कैसे उन्हें भुलाऊँ?

 

बता लेखनी मेरी मुझको।

गीत मैं कैसे गाऊँ?

 

त्याग ,प्रेम ,बलिदान की बातें,

जन -जन के कल्याण की बातें,

शक्ति- शील,सम्मान की बातें

जागृति के अभियान की बातें,

झूठी बातों के पर्वत पर ,

निज संस्कृति की धवल पताका,

किस मुँह से फहराऊँ?

 

बता लेखनी मेरी,मुझको,

गीत मैं कैसे गाऊँ?

 

सब प्राणों में संवेदन छलके,

सपन न कोई उडा़न को तरसे।

जब सम्मान देश का सरसे,

अंबर से हरियाली बरसे।

मुखर हो कर्मयोग गीता का,

मैं तभी कुछ आस लगाऊँ।

मैं गीत सुनहरे गाऊँ।

 

बता लेखनी मेरी ,मुझको,

कैसे गीत मैं गाऊँ?

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