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कविता: ओ शरद पूर्णिमा के चन्दा (डॉ• निशा पारीक, जयपुर, राजस्थान)

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार डॉनिशा पारीक की एक कविता  जिसका शीर्षक है “ओ शरद पूर्णिमा के चन्दा”:

रजनी   की  नीरवता   में  तू,

फैला स्वप्निल धवल  किरण|

राका  निशा  का प्रियतम  तू,

आता छवि ले चन्द्र  किरण||

        छा  जाता   मधुर   उजाला,

        बनकर    प्रणयंकर     तारा|

        आलोक  विकल  निशा का,

        ओ शरद  पूर्णिमा के  चन्दा||

षोडशी यौवन सा खिलता,

उर्वशी   उर   सा     महका|

तू स्नेहसिक्त विरहाकुल का,

रग रग चन्दन शीतलता का|

         तेरी  छाँव में ह्रदय  बहला,

         तू अगन  शीत  सा  दमका|

         प्रिय प्राणेश्वर  सा  सजता,

         ओ शरद पूर्णिमा के चन्दा ||

धरती  ने  शीत  साड़ी   पहनी,

ठिठुरा  अंतस  आकाश  मही|

राधा  संग  रास  रची  जगती,

अम्बर  में जीवन ज्योत सजी||

           तू  विश्व  वेदना का  सहारा,

           औषधि  बन श्वास  समाया|

           धरती    की   जीवन  धारा,

             शरद पूर्णिमा के चन्दा ||

मेरी विनती भी तू सुन  ले,

प्रियतम  को  संदेशा  देदे|

तेरा  रूप  विरह  जगाता ,

विकल    रागिनी   गाता||

               धरती  दुल्हन  सी   सजती,

               अम्बर  प्रियतम से  मिलती|

               मेरे   प्राणाधार  मिला  जा ,

               ओ शरद  पूर्णिमा के चन्दा ||

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