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कविता: देवता गुनाहों का आज! (कैलाश सराफ "कैलाश", चिंचवड़, पुणे, महाराष्ट्र)

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के
 "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार कैलाश सराफ "कैलाश" की एक कविता  जिसका शीर्षक है “देवता गुनाहों का आज!”: 

मानव बन गया एक अंधा,
उधर पोषण का बना लिया धर्म को धंधा!!
धर्म की दुकान खोल बन गए ठेकेदार,
दूसरी और लड़ते हैं जैसे हो दुकानदार!!
हमको अलग अलग करता है धर्म
मेरा धर्म अच्छा!
कोई कहता मेरा धर्म अच्छा!!
सहारा धर्म का
करते हैं भ्रष्टाचार,
व्यभिचार, लूटमार
कई होते हैं घिनोने काम
आदमी बन जाता है भागीदार।।
लंबा तिलक लगाएं चादर धर्म की ओढ़कर,
अपने छुपाते अपराध दुनिया ना देखें इस कदर।।
एक कहावत चरितार्थ है!
लंबा तिलक मधुर वाणी दगाबाज की यही निशानी!!
आदमी लूट रहा,धर्म और समाज में आज
वजह है, बन गया देवता गुनाहों का आज!!
यह कैसा धर्म ,जगह न छोड़ी अफसोस के लिए आज।।
स्वार्थ का रंग भर गया है आज,
आदमी से आदमी दूर होता गया है आज।।
धर्मान्ध हो आदमी ऐसा उलझ गया, आतंकवाद को बना लिया एक धंधा।।
मानव बन गया एक अंधा!!

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