पश्चिम
बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंस" से
प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद
हिंदी ई-पत्रिका" के वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके
सामने प्रस्तुत है रचनाकार कैलाश सराफ "कैलाश" की एक कविता जिसका
शीर्षक है “देवता गुनाहों का आज!”:
मानव बन गया एक अंधा,
धर्म की दुकान खोल बन गए ठेकेदार,
हमको अलग अलग करता है धर्म
मेरा धर्म अच्छा!
कोई कहता मेरा धर्म अच्छा!!
सहारा धर्म का
करते हैं भ्रष्टाचार,
कई होते हैं घिनोने काम
आदमी बन जाता है भागीदार।।
लंबा तिलक लगाएं चादर धर्म की ओढ़कर,
एक कहावत चरितार्थ है!
लंबा तिलक मधुर वाणी दगाबाज की यही निशानी!!
आदमी लूट रहा,धर्म और समाज में आज
वजह है, बन गया देवता गुनाहों का आज!!
यह कैसा धर्म ,जगह न छोड़ी अफसोस के लिए आज।।
स्वार्थ का रंग भर गया है आज,
धर्मान्ध हो आदमी ऐसा उलझ गया, आतंकवाद को बना लिया एक धंधा।।
मानव बन गया एक अंधा!!


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