पश्चिम
बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद
पब्लिकेशंस" से प्रकाशित होने वाली
सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिका" के वेब पोर्टल पर आपका स्वागत
है। आज आपके सामने प्रस्तुत है
रचनाकार शिबानी प्रसाद की एक कविता जिसका
शीर्षक है “ख्याल ......”:
एक ही सयारे पर
हमारा यूं ही मिलना
भी क्या,
कोई मिलना होता है?
मिलकर बिछड़ जाना
फिर यूं ही बिछड़ कर
मिल जाना,
भी क्या
कोई मिलना होता है?
सारे जहां की खबर
रखते हो तुम
मेरी खबर सुनकर भी
अनसुनी कर देना
ये भी क्या
कोई खबर लेना होता है?
दरख़्तों से बात
की है
मैंने तुम्हारी
दिख जाये कहीं तो
बता देना कि,
देख कर भी अनदेखी
कर देना गुनाह होता है।
पक्षी छोड़ रखे
हैं
तुमने मेरे पीछे
लौट आए तो पूछ लेना
ठीक हूं मैं, कहना
बड़ा कठिन होता है।
बादलों से बरसते
मोती छिपा कर रखे हैं,
मैंने तुम्हारे
लिए
आऔ कभी तो
लेते जाना,
भला तोफा भी क्या, कोई
मना करता है?
तस्वीर है
तुम्हारी
अभी भी मेरे फ़ोन में कई
भला अपनों को भी
कोई यूं जुदा करता है?
मेरी बातें तो
पसंद थी ना
तुम्हें बहुत
अब यही तुम्हें,
मसला लगता है?
तुम कहा करते थे
काली बिंदी लगाया करो
जचती है बहुत तुमपे
अब वही साज श्रृंगार
सब बेवफा लगता है !
झूठ की बुनियाद
पर, हमेशा
बिखर जाते हैं रिश्ते
जिसे जोड़ने पर भी
दरार रह जाया ही करता है ....
एक ही सयारे पर
हमारा यूं ही मिलना
भी क्या,
फिर यूं ही बिछड़ कर
मिल जाना,
कोई मिलना होता है?
रखते हो तुम
मेरी खबर सुनकर भी
अनसुनी कर देना
ये भी क्या
कोई खबर लेना होता है?
मैंने तुम्हारी
दिख जाये कहीं तो
बता देना कि,
कर देना गुनाह होता है।
तुमने मेरे पीछे
लौट आए तो पूछ लेना
ठीक हूं मैं, कहना
बड़ा कठिन होता है।
मोती छिपा कर रखे हैं,
आऔ कभी तो
लेते जाना,
मना करता है?
अभी भी मेरे फ़ोन में कई
भला अपनों को भी
कोई यूं जुदा करता है?
तुम्हें बहुत
अब यही तुम्हें,
काली बिंदी लगाया करो
जचती है बहुत तुमपे
अब वही साज श्रृंगार
सब बेवफा लगता है !
बिखर जाते हैं रिश्ते
जिसे जोड़ने पर भी
दरार रह जाया ही करता है ....


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