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कविता: दानव से मानवता की ओर ... (सीमा गर्ग मंजरी, मेरठ, उत्तर प्रदेश)

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार सीमा गर्ग मंजरी की एक कविता  जिसका शीर्षक है “दानव से मानवता की ओर ...”: 

पढ़ने बैठी जब मैं पुस्तक लेकर,

दानव रूप चला आया ये वानर !

मुख पर पट्टी  सिर उगे दो सींग,

नरभक्षक हाथ बाँधे पैने नाखून

 

घूरती कातिल छलिया सी निगाहें,

दिव्य त्रिशूल चिन्ह से गुदी बाँहें !

बुद्धिबल से नहीं है कुछ बढकर,

प्रेमपाश में बैठा वो समीप आकर!

 

मुँह पे उँगली रख कुछ समझाया,

नारी शक्ति का अहसास कराया

सुशिक्षा से युक्ति ध्यान टिकाया!

अमोल शिक्षा का दीप जलाया

 

हम सब एक ईश्वर की संतान,

यही समझाते हमें वेद पुराण !

धैर्य तप शील संयम हैं वरदान,

इन्हें अपनायें  होगा कल्याण !

 

त्रिगुण कर्म से बदले भाग्य लेख,

कर्म फल से बने  मानव दानव !

सात्विक कर्म बनाते संत सुजान,

छल दम्भ कपट से दानव मान!

 

नारी जननी है नारी बेटी भगिनी,

नारी ही  सृष्टि की शक्ति संचारी !

नारी भूषण  नारी दैवीय वरदान,

करें सम्मान वो  है मानव महान !

 

अहिंसा शौच सदाचार नैतिकता,

इन्हीं से जीवन आती सात्विकता !

दानव मानव बस कर्मों की खेती,

सुकर्मी की गति मति  सुधरती !

 

पूँछ सींग अवगुण सब गायब होंगे,

ईश कृपा से कर्म सुफल सब होंगे !

कुटिल कर्मों से  बुद्धि दूर भागेगी,

निश्चित दानव में मानवता जागेगी !!

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