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कविता: मेरा गाँव मेरा देश (मोहनलाल सिंह, देवघर, झारखंड)

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के
 "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार मोहन लाल सिंह की एक कविता  जिसका शीर्षक है “मेरा गाँव मेरा देश”:
 
जन्म भूमि यह तपोभूमि यह
बहती अजय नदी की पावन धारा ।।
स्वतंत्रता सेनानी का अमिट छाप ।
लिखता है इतिहास हमारा ।।
गाँव मैं रहते किसान मजदूर
गाँव की लगती अपनी चौपाल ।।
हर बातों को निपटारा कर
करते यहाँ न्याय संगत विचार ।।
किसान मजदूर गले मिलाते हैं
खेतों को हवण कुंड बनाते हैं ।।
लहू पसीने के इंधन से
फसल खुब लगाते हैं ।।
झूम उठे खेत की बाली
पक गई अब कितने सारी ।।
जिसमें है कुछ हरियाली
वो कहते मेरे पकने की बारी ।।
हवन कुंड से फलित अन्न
से देश को समृद्ध बनाते हैं ।।
गाँव से देश बनाते हैं ।
पके अन्न से पूजन कर
उत्थान ऐकादशी मनाते हैं ।।
देश को समृद्ध बनाते हैं ....
पकते अन्न संदेशा दे जाते हैं
एक दिन तुम पक जाओगे ।।
पक जाएगी विवेक और बुद्धि
बाल सफेद भी हो जाऐंगे ।।
कुछ तो ऐसा कर लो प्यारे
जब तुम गढकर चल जाओगे ।।
एक कहानी सबके मन में
जब तुम हँसते चल जाओगे ।।
दुनिया रूदन से डूब जाऐगा करो तुम ऐसा देश के खातिर ।।
रहे न कोई भूखा नंगा
साथ मिलकर श्रम गीत सब गाते ।।
ढोलक करताल के साथ सब
मंगल भजन साथ है गाते ।।
मिलकर सब खुशिया मनाते
आ जाए विपदा जब भारी ।।
एक साथ कंधे मिलाते
एका का स्वर साथ है गाते ।।
नाट्य मंचन, सांस्कृतिक गायन
हर मंगल को खुब मनाते ।।
श्री राम भक्त बजरंगबली के
मंदिर को है खुब सजाते ।।
पंचम स्वर स्वर लहरी देकर
हनुमान जी को खूब मनाते ।।
अतुलित उमंग नदी धारा संग
मोती रूप चुन शब्द सजाते ।।
कण कण-कण में ब्याप्त हरिनाम ले अमंगल को दूर भगाते ।।
वन उपवन यहाँ है सखी सहेली ।
प्रकृति मंगल मोद मनाते ।।
यहाँ मिली तीन नदिया आकर
अजय, पतरो और जयन्ती ।।
त्रिवेणी के पावन किनारे
मकर संक्रांति में मैला लगते ।।
एकता पावन रूप निखरकर
वहीं से जीवन डोर है सजते ।।
नऐ सम्बन्ध सूत्रधार बन
पता की डोरी वहीं से सजते ।।
अक्षय बट विशाल
देख निहाल ।।
रामायण के गायन
पर शुद्ध बुद्ध लाभ ।।
नवप्रभात नव प्रभात
घंटा शंख ध्वनि स्वर संग
प्रबुद्ध, बाल सुन मन निहाल ।।
मानव ही नहीं पक्षी भी
यहाँ को ललाईत आने को रहते ।।
एक विशाल डेम के जल पवाह
आस्ट्रेलियन पज्ञी आकर करते विहार ।।
ओह्ह क्या सौन्दर्य वाह
मन आकषिर्त होता उस ओर ।।
आनंद ही आनंद है नहीं
मिलता हृदय में छोर ।।
अद्भुत छठा सौन्दर्य रूप
कैसे वणॅण करूं मिलता नहीं शब्द रूप ।।
लालिमा लेकर भगवान सूर्यदेव रूप ।
करते नमन बन्दन अभिनन्दन यह सौन्दर्य रूप ।।
हर्षित होकर मेरा नयनाभिराम
करते बखान जय श्री राम ।।
मेरा गाँव मेरा देश
मेरा गाँव मेरा देश ।।

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