पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंस" से प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिका" के वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार महेन्द्र सिंह 'राज' की एक कविता जिसका शीर्षक है “मेरी कविता”:
कहां गई तूं मेरी कविता
मेरे पास भी
अब आ जा
मेरी जीवन बगिया
में भी
कुछ प्रेमके
पुष्प खिलाजा।
जोभाव संचरित
होते मन में
उनको होठों
पर लाएं त्रकैसे
शब्द ही रूठ गए
हमसे अब
तुम बोलो उन्हें
मनाएं कैसे।
मेरे मन के भावों
की मंजू
क्या बाल रूपमें
मर जाएगी
यापा आशीर्वाद
गुरुद्रोण का
कभीं विकसित
हो पाएगी।
पर नहीं चाहिए
कृपा द्रोणकी
दक्षिणा में
अंगुठा ले लेंगे
मुझे जान
पद दलित शुद्र
क्या मुझको वो
शिक्षा देंगे।
निजमन के भावों
की मंजूषा
निज साथ लिए मैं
फिरता हूं
कोई तो अभयदान दे
मुझको
बीच भंवर में
डूबता तिरता हूं।
कुछ पाने को मैं ही विप्र बन
परशु राम तक वन में
धाया
शिक्षा पूरी कर ली
फिर भी
प्रचण्ड शाप गुरवर से पाया।
यह समाज कितना निष्ठुर है
निर्बल को
कब जीने देता
कुछ हासिल करना चाहे तो
जाति व
धर्म के ताने देता।
जीने का हक
उनको भी है
जो जन प्रारब्ध
वश शुद्र बने
देखा सबने शिव
प्रचण्ड रूप
जब सती
दाह पर रुद्र बने।
हम पूजा करते
श्रीरघुमणि की
जो शबरी के जूठे
बेर भी खाए
विभीषण बानर भालू व केवट
को भी कितने प्रेम से अपनाए।
हम सब
पूजते वासुदेव को
विप्र सुदामा
को मित्र बनाए
अन्न विहीन
दुर्दिन आने पर
देखो उनका कैसे
साथ निभाए।
तुम वीर
सपूतों उठो धरा के
अपने सारे भय अरु
भ्रम त्याग
जाति वर्ग
का भेद मिटा दो
लगा दो जग में
क्रांति की आग।
कितना सुन्दर
दिन वो होगा
जब जाति न होगी,केवल हिंदू
एक यही उद्देश्य
रखो सभी
यही संस्कार का
चरम विन्दु।


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