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कविता: माँ (नीरज रमेश "नीर", उदयपुर, राजस्थान)

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार नीरज रमेश "नीर" की एक कविता  जिसका शीर्षक है “माँ”:

सकल  जीव के स्वयं सृजन की अनकही परिभाषा हो तुम
हर आत्मा की निज अभिलाषा, बिन शब्दों की भाषा हो तुम
वृक्ष जले जो स्वयं धूप में "मधुर छाँव" देने की खातिर
शीतल आँचल फैलाये ,  बनी अमिट प्रत्याशा  हो तुम
स्वयं जलकर लौ  बनती दीपक की, हरती जग का अंधियारा
रक्त जलाकर मेरे जीवन की मिहिर रूपी प्रकाशा हो तुम
नदी नीर से प्यासी रहकर, प्यास बुझाये सागर की
निज जीवन को अर्पण करके, मेरे जीवन की विपाशा हो तुम 
हर रिश्ते का आधार है जननी, सचमुच इक अवतार है जननी
कुदरत की अनमोल, अद्वितीय,  अतुलनीय  मीमांसा हो तुम
में भी वो खुशनसीब हूँ जिसको नेह का संसार मिला
माँ का आँचल, पिता का संबल और जीवन का आधार मिला
आजीवन, आजन्म, आकंठ  कोटि  कोटि ऋणी हूँ में  माँ ….
कोखों की पीर का ... वक्षों के क्षीर का ... नयनों  के नीर का ...
रातों की लोरी का ... भीगे भीगे गद्दों का .. और गोदी के झूले का ..
बे हिसाब कष्ट मेने हरदम दिए, और बदले में सदा सारे सुख ले लिए
न हो सकूँगा कभी में श्रवणआपका, मगर आप रहोगी सदा "देवकी"
में रहा सदा तप्त शुष्क मरुस्थल”, आप रही सदा बारहमासी श्रावण
एक इल्तजा, एक प्रार्थना ऋणी रहूँ इन मधुर ऋणों का
मधुर छाँव तले .. मुझे क्षमा मिले .. मेरा संसार फले ...
मधुर छाँव तले .. माँ के पाँव तले .. मेरा जीवन चले .. चलता ही रहे .....

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