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कविता: नवोदित कवि (गौरव नागरा, जगाधरी, यमुना नगर, हरियाणा)

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार गौरव नागरा की एक कविता  जिसका शीर्षक है “नवोदित कवि”:

क्षण किंचित भी नहीं मिलता, उसको कैसे बतलाऊं।

अभी अभागा जगा ही हूँ मैं, उसको कैसे बहलाऊं।।

मौन व्यथा चुप्पी साधे, साधो अब तो कुछ बोलो।

अब खत्म करो ये गूंगापन, भेद जरा वो चार भी खोलो।।

किसके उप्पर तुम मरते थे, किसके लिए श्रृंगार करते थे।

किसकी बाहों मे जा जाकर,लंबी लंबी आहें भरते थे।।

इतना ध्यान एकाग्र करके, घंटों घंटों बैठे रहते।

व्यथा, पीड़ा, आत्म हाल, ये सब तुम किसको कहते।।

तुम्हारी जिज्ञासा, अभिलाषा, सुख दुख, आत्म कथा का साथी कौन।

अरे ! नव ऊर्जा संचारित मानुष, तुम्हारी व्यथा अभी भी मौन।।

रुको बताता हूं अच्छा नहीं है, खुद मन ही मन ख्याल बुनना।

एकाएक टकी लगाकर बैठो, अविरल ही तुम मुझको सुनना।।

एक नवविकसित कवि हूं, काफिला बहुत अनोखा है।

ये कलम पथ ही सही है बाकी सब कुछ धोखा है।।

कलम कायांतर होकर जब जब, अपने पथ पर चलती है।

मेरी मौन व्यथाओं को ये खुद बे - खुद ही गढ़ती है।।

मेरी आत्म कथा, सुख दुख को, ये पृष्ठ गामिनी समझती है।

मान्यवर वो श्रृंगार इस हेतु ही था, क्यूंकि ये भी श्रृंगार से चलती है।।

मानव के सौ मुखौटों से जब जब जी इतराता है।

तब तब इस धरा से मन निरंतर उठता जाता है।।

तब कहिं जाकर कोई समुद्र, समेटता है एक सरिता।

कलम गौरव से झूम उठती है, और बनती है एक कविता।।

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