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कविता: सरिता (सुखदेव सिंह राठिया, रायगढ़, छत्तीसगढ़)

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार सुखदेव सिंह राठिया की एक कविता  जिसका शीर्षक है “सरिता”:

तटिनी हो तुम,

जन-जन की प्रेरणादायिनी हो।

            निरंतर अग्रसर रहती हो,

            सुधा - गरल धारिणी हो।।

 

महिमामयी हो तुम,

संस्कारों की जननी हो।

            बहती अमृत की धारा तुझमे,

            ऐसी तुम पथगामिनी हो।।

 

ऐक्य भावना लिए,

निः स्वार्थ कर्मकारिणी हो।

           भेद - विभेद समंदर में हुआ सम,

           अतएव कहलाती कर्तव्य परायणी हो।।

 

श्रद्धा हो तुम,

रीति-संस्कृति दायिनी हो।

            सेवा - सदभाव समाहित तुझमे,

            वेद कहता तुम कल्याणी हो।।

 

कल - कल करती,

सुर - ताल छेड़े ऐसी रागिनी हो।

           सृष्टि हेतु एक वरदान हो तुम,

           अतएव कहलाती कल्लोलिनी हो।।

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