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कविता: मां की ममता (गीता चौहान, जशपुर, छत्तीसगढ़)

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के
 "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंससे प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिकाके वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार गीता चौहान की एक कविता  जिसका शीर्षक है “मां की ममता”:
 
मां तु कितनी प्यारी है।
सारा संसार अंधेरा है।
तू प्रकाश का सूरज है।
तेरी आंखों में प्रेम के बादल।
प्रेम तेरा बारिश जैसा मां।
मां तु कितनी प्यारी है।
डॉट तेरी है मिर्ची जैसी।
तुझ बिन सब फीका - फीका मां।
शहद सी मीठी तेरी बातें।
तुझसे मिलने मैं तरसुं मां।
मां तु कितनी प्यारी है।
जब भी मैं गलती करती।
छड़ी दिखा - दिखा डराती मां।
तेरे हाथों में जादू की छड़ी है।
जो हरदम मुझे नचाती मां।
मां तु कितनी प्यारी है।
नींद काटकर अपने हिस्से की।
लोरी गा - गा मुझे सुलाती मां।
मेरे बीमार होने पर।
रात - रात भर रोती जागती मां।
मां तु कितनी प्यारी है।
मुझे भर पेट खिला कर रोटी।
खुद भूखी रह लेती मां।
आधी रोटी खुद खाती।
और पूरी हमें खिलाती मां।
मां तु कितनी प्यारी है।
अपनी चोट भुलाकर सारी।
मेरे फोड़ों पर मरहम लगाती मां।
अपने आंसू छुपाकर सारे।
मेरी आंसू पोंछती मां।
मां तु कितनी प्यारी है।
बुरी नजर से बचा लेती है।
अपने आंचल से ढंक लेती मां।
काला टीका लगाकर रखती हरदम।
दुनिया की बुरी नज़रों से बचाती मां।
मां तु कितनी प्यारी है।
मेरी जीत के लिए।
खुद हार जाती मां।
पिता की डांट से बचाने।
मेरे लिए झूठ बोलती मां।
मां तु कितनी प्यारी है।
बे - पनाह प्यार करती हमसे।
कितनी उपमाएं जोड़ें हम।
तू सब उपमा से न्यारी है मां।
मां तु कितनी प्यारी है।।

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