पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंस" से प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिका" के वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार सन्ध्या पाण्डेय की एक कविता जिसका शीर्षक है “पीहर की दिवाली”:
जी करता है ---
इक बार पीहर होकर
आऊँ,
सपनों में ही सही --- इस बार दीवाली वहां मनाऊं।
जहां बसा दादा का
प्यार,
सुंदर सा है, घर का द्वार।
उस द्वार पर
बंदनवार सजाऊँ
इस बार दीवाली –-- वहां मनाऊं।।
जहां है दादी के
कान्हा का श्रृंगार,
नित नए भोग संग तुलसी और हरसिंगार।
उस पूजाघर में
रंगों की रंगोली सजाऊँ।
इस बार दीवाली
--- वहां मनाऊं।
जहां है बाबा के
सख्त ह्रदय में कोमल व्यवहार,
जीवन पथ के
कर्तव्य और संघर्षों की दीवार
उस दीवार पर जाकर
चित्र सजाऊँ।
इस बार दीवाली --- वहाँ मनाऊं
जहां के अंगना
में मां की खुशबू, जिसमें बीता मेरा बचपन ।
उस आंगन में जाकर
अल्पना बनाऊँ।
इस बार दीवाली --- वहाँ मनाऊँ।
जहां की रसोई में
बुआ की खुशबू, बर्फी पेड़ा ठंड के लड्डू ।
उस घर जाकर
गुझिया बनाऊँ।
इस बार दीवाली --- वहां मनाऊं।
जहां की छत पर
पतंग उड़ाई, खूब लड़े हम बहन और भाई।
उस छज्जे पर आकाश
दीप जलाऊँ।
इस बार दीवाली --- वहां मनाऊं।
जहां की देहरी पर
सखियांआती, जिसे पूजकर इस घर आई।
उस देहरी पर दीप
जलाऊं।
इस बार दीवाली
वहां मनाऊं
इस बार दिवाली
वहां मनाऊँ।
सपनों में ही सही
इस बार
दीवाली वहां
मनाऊँ।
उस देहरी पर दीप
जलाऊं


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