पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी
जिले के "लक्ष्यभेद पब्लिकेशंस" से प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका "लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिका" के वेब पोर्टल पर आपका
स्वागत है। आज
आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार सुधीर श्रीवास्तव की एक कविता जिसका शीर्षक है “ठंढ के दिन आए”:
ठंढ का दिन
धीरे धीरे आ रहा है,
कंबल,रजाई, स्वेटर, जैकेट
टोपी, मफलर अब
निकलने लगे हैं।
गाँवो में तो अब
अलाव भी जलने लगे हैं।
घर/आफिस/दुकान/प्रतिष्ठान में
पंखे विश्राम की मुद्रा में आ गये हैं।
बुजुर्ग साल,स्वेटर में आ गये हैं,
बच्चे अभी नखरे दिखा रहे हैं।
अब सबको सचेत रहने की
जरूरत है भाई,
क्योंकि ये मौसम अपने साथ
बीमारियाँ भी ला रहे हैं,
ठंढ के मौसम जो आ गये हैं।
ठंढ का दिन
धीरे धीरे आ रहा है,
कंबल,रजाई, स्वेटर, जैकेट
टोपी, मफलर अब
निकलने लगे हैं।
गाँवो में तो अब
अलाव भी जलने लगे हैं।
घर/आफिस/दुकान/प्रतिष्ठान में
पंखे विश्राम की मुद्रा में आ गये हैं।
बुजुर्ग साल,स्वेटर में आ गये हैं,
बच्चे अभी नखरे दिखा रहे हैं।
अब सबको सचेत रहने की
जरूरत है भाई,
क्योंकि ये मौसम अपने साथ
बीमारियाँ भी ला रहे हैं,
ठंढ के मौसम जो आ गये हैं।


0 Comments